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राजापाकर: कबीर मठ आश्रम में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया गया संत कबीर प्राकट्य दिवस

राजापाकर: कबीर मठ आश्रम में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया गया संत कबीर प्राकट्य दिवस

राजापाकर (वैशाली)। राजापाकर स्थित कबीर मठ आश्रम परिसर में सोमवार को संत शिरोमणि कबीरदास का प्राकट्य दिवस श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण के बीच मनाया गया। कार्यक्रम में विभिन्न राज्यों से आए कबीरपंथी साधु-संत, महात्माओं एवं बड़ी संख्या में ग्रामीण श्रद्धालुओं ने भाग लेकर संत कबीर के विचारों को आत्मसात करने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ कबीर मठ आश्रम के महंत ज्ञान प्रकाश शास्त्री ने दीप प्रज्वलित कर किया। अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने कहा कि संत कबीर हिंदी साहित्य के महान संत, समाज सुधारक और निर्गुण भक्ति धारा के प्रमुख कवि थे। उन्होंने अपने दोहों और साखियों के माध्यम से प्रेम, सत्य, समानता और ईश्वर भक्ति का संदेश दिया तथा जाति-पाति, ऊंच-नीच, अंधविश्वास और धार्मिक पाखंड का सशक्त विरोध किया।
महंत ने बताया कि संत कबीर का जन्म लगभग 1398 ईस्वी में वाराणसी के लहरतारा क्षेत्र में माना जाता है। लोक मान्यता के अनुसार उनका पालन-पोषण नीरू और नीमा ने किया था। उन्होंने औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की, लेकिन सत्संग और जीवन के अनुभवों से गहन ज्ञान अर्जित किया। उनकी वाणी आज भी समाज को सत्य और मानवता का मार्ग दिखाती है।


कार्यक्रम का संचालन शिक्षाविद रविंद्र प्रसाद सिंह एवं नगीना प्रसाद सिंह ने किया। उन्होंने कहा कि कबीर साहब की रचनाएं दोहा, साखी, शब्द और रमैनी के रूप में उपलब्ध हैं तथा उनकी वाणी का प्रमुख संग्रह ‘बीजक’ है। उन्होंने कहा कि कबीर ने मानव सेवा, सच्ची भक्ति, सत्य, प्रेम और सदाचार को जीवन का आधार बताया तथा भेदभाव और धार्मिक आडंबर का विरोध किया।
वक्ताओं ने कबीर के प्रसिद्ध दोहे “बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोय; जो दिल खोजा अपना, मुझसे बुरा न कोय” का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी शिक्षाएं आज भी समाज में सद्भाव, आत्मचिंतन और नैतिक जीवन की प्रेरणा देती हैं।
इस अवसर पर प्रसिद्ध व्यास मजे लाल राय ने कबीर साहब के दोहों, भक्ति गीतों, प्रवचनों और भजनों की प्रस्तुति देकर उपस्थित श्रद्धालुओं को उनके उच्च विचारों से अवगत कराया। वहीं डॉ. गौरीशंकर कुमार द्वारा निःशुल्क मेडिकल कैंप लगाकर लोगों का स्वास्थ्य परीक्षण एवं उपचार किया गया।
कार्यक्रम में नगीना प्रसाद सिंह, रविंद्र प्रसाद सिंह, अनिल कुमार, हरिशंकर गोसाई, प्रमोद कुमार, मजे लाल राय, रामबालक दास, हरेंद्र गोसाई, प्रो. रघुवंश राय, दिनेश प्रसाद राय, राम इकबाल गोसाई, मंटू गोसाई, जगदीश गोसाई सहित जिले के विभिन्न मठों के मठाधीश, संत-महात्मा उपस्थित रहे। इसके अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुवाहाटी और नेपाल से आए साधु-संतों की भी उल्लेखनीय भागीदारी रही।