-महाराष्ट्र से लेकर झारखंड तक…नियम और नैतिकता की ऐसी-तैसी!
-जारी है ‘दबंग’ सियासत
दीपक कुमार तिवारी।पटना/नई दिल्ली।
सियासत में अजब-गजब घटनाएं अब चौंकाती नहीं हैं। हालांकि राजनीति की अजब-गजब घटनाएं नई बात नहीं हैं। कम सांसदों के बावजूद चंद्रशेखर के प्रधानमंत्री बनने की घटना हम देख चुके हैं। झारखंड में निर्दलीय मधु कोड़ा को भी लोग सीएम बनते देख चुके हैं। दूर न भी जाएं तो बिहार में तीसरे नंबर की पार्टी के प्रमुख नीतीश कुमार सीएम के रूप में अगले साल पांच साल का कार्यकाल पूरा कर लेंगे। राजनीति शास्त्र का ककहरा सीखने वाले विद्यार्थी इस बात से भ्रमित जरूर हो रहे होंगे कि अब तक का उनका ज्ञान अधूरा है। वे तो अब तक यही पढ़ते-जानते आए हैं कि बहुमत प्राप्त करने वाली सबसे बड़ी पार्टी का नेता ही देश या राज्य या विधायी प्रमुख होता है।
राजनीति का अजूबा सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं रह गया है। अब तो और भी अजूबे दिख रहे हैं। महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित हुए सप्ताह भर से अधिक हो रहे हैं। नई सरकार का गठन नहीं हो पाया। कार्यवाहक सीएम के भरोसे सूबा के काम चल रहा है। अभी तक लोग यही जानते रहे हैं कि समय पर सरकार न बन पाने की स्थिति में शासन राज्यपाल के हाथ चला जाता है। पर, कहीं इसकी चर्चा भी नहीं हो रही।

झारखंड में सीएम के रूप में हेमंत सोरेन ने शपथ ले ली। मंत्रिमंडल में अकेले सीएम सरकार चार दिनों से चला रहे हैं। मंत्रिमंडल का विस्तार कब होगा, किसी को पता नहीं। इंडिया ब्लाक की चार पार्टियों में सीपीआई (एमएल) ने मंत्रिमंडल में शामिल होने से मना कर दिया है। आरजेडी कोटे से कौन मंत्री बनेगा, यह भी अभी तक चर्चा तक ही सीमित है। इंडिया ब्लाक में 16 विधायकों के साथ दूसरे नंबर की पार्टी कांग्रेस अभी तक अपने संभावित मंत्रियों के नामों पर विचार कर रही है। नतीजतन हेमंत सोरेन का मंत्रिमंडल नहीं बन पाया है।
जेल में रह कर आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल सरकार चलाते रहे। उनके मंत्रियों ने भी जेल जाने के कई महीने बाद मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया। कर्नाटक के सीएम सिद्धारमैया के खिलाफ मामला चल रहा है। वे इस्तीफा न देने पर अड़ गए हैं। नियमों-कानूनों में उन्हें ऐसा करने की छूट है। अलबत्ता राजनीति में इसके लिए नैतिकता की परंपरा रही है। ऐसी नौबत आने पर नेता नैतिक आधार पर इस्तीफा देते रहे हैं। अब तो लगता है कि राजनीति में नैतिकता का न कोई मान बचा है और न इसकी जरूरत रह गई है।











