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बिहार चुनाव 2025: तेज प्रताप को करारी हार, साली डॉ. करिश्मा राय की ऐतिहासिक जीत ने बदला यादव परिवार का सियासी समीकरण

-बिहार चुनाव 2025: तेज प्रताप को करारी हार, साली डॉ. करिश्मा राय की ऐतिहासिक जीत ने बदला यादव परिवार का सियासी समीकरण

ब्यूरो।पटना।

बिहार विधानसभा चुनाव ने इस बार राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के परिवार को मिला-जुला संदेश दिया—एक तरफ सियासी झटका, तो दूसरी तरफ चौंकाने वाला इनाम। सबसे बड़ा धक्का लगा लालू के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव को, जिन्हें महुआ सीट पर बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। वहीं छोटे बेटे तेजस्वी यादव ने राघोपुर से जीत दर्ज कर अपनी राजनीतिक पकड़ कायम रखी।

लेकिन पूरे चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा जिस नाम की हुई, वह है तेज प्रताप की साली और राजद प्रत्याशी डॉ. करिश्मा राय। परसा सीट से चुनाव लड़ रहीं करिश्मा ने अपनी पहली राजनीतिक पारी में ही ऐतिहासिक जीत दर्ज की। उन्होंने 89,093 वोट हासिल कर जदयू उम्मीदवार छोटेलाल राय को मात दी, जिन्हें सिर्फ 63,321 वोट मिले। यह जीत राजद के लिए नई ऊर्जा का स्रोत बनी है।

तेज प्रताप यादव तीसरे नंबर पर, राजनीतिक भविष्य पर उठे सवाल:

महुआ सीट पर तेज प्रताप का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा।
लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के संजय कुमार सिंह ने यहां जीत हासिल की, जबकि तेज प्रताप तीसरे स्थान पर खिसक गए। यह परिणाम उनके राजनीतिक भविष्य के लिए चिंता का विषय माना जा रहा है—खासकर तब जब वे पिछले कुछ वर्षों से विवादों और संगठनात्मक असहमतियों के कारण सुर्खियों में रहे।

करिश्मा राय की जीत क्यों है खास?

पेशा—डेंटिस्ट
परिवार—पूर्व मुख्यमंत्री दरोगा राय की पोती
रिश्ता—तेज प्रताप की पत्नी ऐश्वर्या राय की चचेरी बहन

पारिवारिक विवादों और राजनीतिक उठापटक के बीच करिश्मा का राजनीति में आना और फिर इतनी बड़ी जीत दर्ज करना चुनाव का सबसे दिलचस्प पहलू रहा।

तेज प्रताप और ऐश्वर्या का वैवाहिक विवाद 2020 से अदालत में लंबित है। इसी विवाद के कारण ऐश्वर्या के पिता चंद्रिका राय ने आरजेडी से दूरी बनाकर जदयू का दामन थामा। पिछले चुनाव में छोटेलाल राय ने चंद्रिका राय को 17,000 वोटों से हराया था, लेकिन इस बार छोटेलाल को उसी परिवार की बेटी करिश्मा राय ने मात दे दी। यह सियासी विडंबना भी खूब चर्चा में है।

तेजस्वी की रणनीति हुई सफल:

चुनाव से पहले तेजस्वी यादव ने करिश्मा राय को राजद में शामिल कराया था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम बेहद रणनीतिक था। परसा के सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए राजद ने सही उम्मीदवार पर दांव लगाया—और नतीजा सबके सामने है।

नया संदेश: वोटर अब प्रदर्शन को तवज्जो देता है

तेज प्रताप की हार और करिश्मा की जीत ने यह साफ कर दिया है कि बिहार का वोटर अब सिर्फ बड़े नाम देखकर फैसला नहीं करता, बल्कि व्यक्ति की साख, मेहनत और स्थानीय पकड़ को प्राथमिकता देता है।

यह चुनाव यादव परिवार के लिए सियासी सबक भी है और नई उम्मीद भी—एक तरफ गिरावट का संकेत, तो दूसरी तरफ नई पीढ़ी के नेतृत्व के उभरने का इशारा।