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निराला निकेतन में महावाणी स्मरण के बैनर तले काव्य गोष्ठी आयोजित, कवियों की रचनाओं ने बांधा समां

-निराला निकेतन में महावाणी स्मरण के बैनर तले काव्य गोष्ठी आयोजित, कवियों की रचनाओं ने बांधा समां

✍🏻 मुजफ्फरपुर। संवाददाता।

नगर के निराला निकेतन परिसर में रविवार को महावाणी स्मरण के तत्वावधान में एक भावनात्मक और साहित्यिक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत अंजनी कुमार पाठक द्वारा आचार्य श्री के गीतों की मधुर प्रस्तुति से हुई, जिसने श्रोताओं को साहित्यिक वातावरण में डुबो दिया।

🎤 वरिष्ठ साहित्यकार शुभ नारायण शुभंकर की अध्यक्षता, संचालन डॉ. हरि किशोर प्रसाद सिंह ने किया

गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार शुभ नारायण शुभंकर ने की, जबकि मंच का संचालन साहित्यप्रेमी डॉ. हरि किशोर प्रसाद सिंह ने किया। गोष्ठी के समापन पर समाजसेवी मोहन सिन्हा ने धन्यवाद ज्ञापन दिया।

🌟 कवियों की विविध रचनाओं ने श्रोताओं को किया मंत्रमुग्ध

कार्यक्रम में भाग लेने वाले कवियों ने हिंदी, भोजपुरी और बज्जिका में अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं। सभी कवियों ने समाज, मानवीय संवेदनाओं, रिश्तों और जीवन के विविध पहलुओं को अपनी कविताओं में पिरोया।

अंजनी कुमार पाठक की “जिंदगी का ना कोई ठिकाना, आज यहाँ कल कहाँ है जाना” ने गूढ़ जीवन दर्शन को सहज भाव में प्रस्तुत किया।

अशोक भारती ने “चाँद पर बढ़ रहे हमारे कदम, गीत गाओगे तुम गुनगुनाएंगे हम” सुनाकर आधुनिकता के साथ काव्य की मिठास जोड़ी।

राजविंद्र जी ने “उतर रेत में” सुनाकर गहराई से प्रभावित किया।

दीन बंधु आजाद की रचना “रेत पे लिखकर मेरा नाम मिटाया ना करो” ने भावनात्मक स्पर्श छोड़ा।

अरुण कुमार तुलसी ने “गुरु बिन भ्रम न मिटे भाई…” से भारतीय अध्यात्म को काव्य में पिरोया।

भोजपुरी गीतकार सत्येन्द्र कुमार सत्यन की प्रस्तुति “बाबा बैधनाथ पूरा करिहे मनवा के आस…” पर श्रोता झूम उठे।

रामवृक्ष राम चकपुरी ने “राहे मंजर झूल से शवों के…” जैसी मार्मिक रचना से संवेदना जगाई।

शुभ नारायण शुभंकर की प्रस्तुति “होता जो संसार प्रेममय…” ने सामाजिक संदेश दिया।

उमेश राज ने बज्जिका में “आज केतना गिर गेल हए आदमी…” सुनाकर क्षेत्रीय भाषा की ताकत को उजागर किया।

डा. हरि किशोर प्रसाद सिंह ने “जय बज्जिका” से भाषा-प्रेम को मुखर किया।

प्रमोद नारायण मिश्र ने “रिश्ता दिल से बनता है, दिखावा से नहीं…” जैसी सरल मगर सटीक रचना प्रस्तुत की।

वरिष्ठ कवयित्री उषा किरण श्रीवास्तव ने “चलो चले ऐसा कुछ गाएं…” से सकारात्मक ऊर्जा जगाई।

युवा कवयित्री संगीता सागर की रचना “ऐ मनुष्य तुम हमेशा से दावा करते रहे…” ने सामाजिक चेतना को नया स्वर दिया।

📚 साहित्यिक संवाद और सृजन की शाम

गोष्ठी के माध्यम से साहित्य प्रेमियों को कविता, भाषा और अभिव्यक्ति के अद्भुत संगम का अनुभव मिला। रचनाओं में सामाजिक यथार्थ, आध्यात्मिकता, प्रेम, व्यंग्य और चेतना के रंग स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आए।

> “काव्य संवाद ही संस्कृति का आधार है, और ऐसे आयोजनों से समाज को संवेदना और विचार की नई दिशा मिलती है।” – शुभ नारायण शुभंकर

 

कार्यक्रम में शहर के कई साहित्यप्रेमी, युवा रचनाकार और शिक्षाविद भी उपस्थित रहे। यह आयोजन एक बार फिर साबित कर गया कि मुजफ्फरपुर की धरती साहित्यिक सृजन की समृद्ध परंपरा को जीवंत रखे हुए है।