Advertisement

गयाजी में जीवित रहते आत्म-पिंडदान की अनोखी परंपरा, जनार्दन स्वामी मंदिर में तीन दिनों तक होता है विशेष अनुष्ठान

-गयाजी में जीवित रहते आत्म-पिंडदान की अनोखी परंपरा, जनार्दन स्वामी मंदिर में तीन दिनों तक होता है विशेष अनुष्ठान

गया। सनातन धर्म की परंपराओं में गयाजी की पावन भूमि का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। यहां पितरों एवं पूर्वजों की मोक्ष-कामना के लिए पिंडदान और श्राद्ध करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। इसी परंपरा से जुड़ा एक अत्यंत दुर्लभ विधान जीवित व्यक्ति द्वारा स्वयं का आत्म-पिंडदान करने का भी बताया जाता है। यह अनुष्ठान गयाजी के भस्मकूट पर्वत स्थित भगवान विष्णु के बाल स्वरूप जनार्दन स्वामी मंदिर से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार संपन्न किया जाता है।

मान्यता है कि आत्म-पिंडदान के माध्यम से साधक सांसारिक मोह-माया से वैराग्य और आध्यात्मिक मुक्ति की ओर अग्रसर होता है। स्थानीय धार्मिक परंपरा में इसे अत्यंत गंभीर और कठोर आध्यात्मिक विधान माना जाता है। इसके बाद साधक सांसारिक जीवन से विरक्ति का संकल्प लेकर धार्मिक जीवन की ओर बढ़ता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह अनुष्ठान तीन दिनों में पूरा होता है। पहले दिन प्रायश्चित, शुद्धिकरण और संकल्प की प्रक्रिया होती है। दूसरे दिन भगवान जनार्दन स्वामी का अभिषेक कर दही और अक्षत से तैयार पिंड भगवान के दाहिने हाथ में समर्पित किया जाता है। मान्यता है कि इस विधान में भगवान जनार्दन स्वयं संतान की भूमिका में पिंड स्वीकार करते हैं। तीसरे दिन भगवान गदाधर की महापूजा और पूर्णाहुति के साथ अनुष्ठान संपन्न होता है।

इस विशेष विधान में शुद्धता और अनुशासन का विशेष महत्व बताया गया है। पूजा सामग्री में मुख्य रूप से अक्षत, दधि और कदली फल का प्रयोग किया जाता है, जबकि धार्मिक परंपरा के अनुसार इसमें तिल का प्रयोग नहीं किया जाता।

गयाजी की इस प्राचीन परंपरा को श्रद्धालु सनातन धर्म के गूढ़ आध्यात्मिक पक्ष से जोड़कर देखते हैं। जनार्दन स्वामी मंदिर से जुड़ी ये मान्यताएं आज भी श्रद्धालुओं के बीच आस्था और जिज्ञासा का विषय बनी हुई हैं।