-सब कुछ छोड़कर जाना है
इस जग में
सबको सब कुछ
मिलता नहीं,
और जो कुछ मिलता है यहाँ,
वो भी हमेशा
साथ रहता नहीं।
धन-दौलत,
मान-सम्मान,
पद-प्रतिष्ठा,
नाम और पहचान—
एक दिन सबको
छोड़कर जाना है,
खाली हाथ आए थे हम,
खाली हाथ ही जाना है।
फिर क्यों
नफरत की दीवारें हैं?
क्यों दिलों में
ईर्ष्या-द्वेष की धारें हैं?
क्यों झूठ,
लूट और बेईमानी?
क्यों स्वार्थ की
इतनी कहानी?
अपना-पराया,
छोटा-बड़ा,
ऊँच-नीच का
क्यों यह फासला?
जब अंत में
सबको एक ही राह पर
चलकर जाना है,
तो क्यों न आज
किसी के चेहरे की
मुस्कान बन जाना है?

क्यों नहीं सीखा हमने
खुलकर मुस्कुराना,
गिरते हुए को
हाथ बढ़ाकर उठाना,
दुख में किसी का
सहारा बन जाना,
और किसी के काम आकर
जीवन को सार्थक बनाना।
जिंदगी मिली है
तो प्रेम से जी लें,
रिश्तों को दिल से सींच लें,
न जाने किस मोड़ पर
सफर थम जाना है,
क्योंकि हँसते-हँसते
एक दिन
सब कुछ छोड़कर जाना है।
इसलिए नफरत नहीं—
प्यार बाँटिए,
द्वेष नहीं—
विश्वास बाँटिए,
दौलत नहीं—
दुआएँ कमाइए,
और जाते-जाते
दुनिया में
अपनी अच्छाई की
एक निशानी छोड़ जाइए।
इस जग में
सबको सब कुछ
मिलता नहीं…
और जो कुछ मिलता है यहाँ,
वो भी
सबको एक दिन
छोड़कर जाना है।
— दीपक कुमार तिवारी















