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विशेष : लिखने के लिए क्या चाहिए?

लिखने के लिए क्या चाहिए? भाषा का ज्ञान, भाव, विषय, समझ और संवेदना के बाद भी ऐसा कुछ है जो शेष रह जाता है। शायद वह इच्छा है। या प्रेरणा शक्ति। कई कई बार महत्वकांक्षा। या पता नहीं क्या है जो लिखता, लिखाता है। कोई क्यों लिखता है, के सैकड़ों ज़वाब हो सकते हैं। हज़ारों दिए जा चुके हैं। लाखों दिए जाएँगे। करोड़ों ज़वाब के बाद भी मनुष्य के पास यह प्रश्न जस का तस शेष रहेगा।

मैं सोचता हूँ एक बात जो लगभग पक चुकी है। लिखने के लिए उसे मैं एकदम तैयार हूँ पर क्यों नहीं लिख पा रहा। कौन है जो रोकता है। या वह बात जिसे लिखना चाहता हूँ वह ही किसी चेतन में बदल गई है और उसमें मन जागृत हो गया है। उसका मन नहीं करता मेरी आत्मा की खोह से निकलने का।

कैसा तो कुहरे का पुल है। नदी के पार पहुँचने का एकमात्र रास्ता। न कोई नाव है और न कोई विद्या। इसी कोहरे के पुल का सहारा है। अपने भ्रम पर इतना यक़ीन करना है कि इस कुहरे में प्राण उतर आएं। मैं इसे काठ कहूँ ये काठ हो जाए। इसे पाषाण कहूँ यह पाषाण हो जाए। इस्पात कहूँ इस्पात हो जाए। मैं इस पर चलता हुआ उस पार निकल जाऊँ।

मैं लहरों को नाव की तरह देखने की कला साध सकूँ तो क्या ही बात हो। मैं इस घाट पर खड़े हुए ऐसे निहारूँ कि घाट अदला-बदली कर लें। पलक झपकाऊं और जादू घटित हो। मेरे लिए मेरा निजी जादू। दुनिया के लिए कुछ न बदले और मेरी दुनिया बदल जाए।

कैसा हो कि मुट्ठी बांधूं और सारा आकाश सिमट आए। चार डग में पृथ्वी नाप लूँ। स्वांस में अग्नि साध सकूँ और धड़कन में वायु। आंखों में समंदर लेकर चलूँ तो लोग निहारते रहें कि कोई बच्चा पहली बार इंद्रधनुष देख रहा हो जैसे।

कल्पना में सारी सृष्टि को एक कागज़ के टुकड़े की तरह चार परत में तह लगाकर अपनी जेब में रख लेने वाला मैं कवि, एक अदद वाक्य लिखने को तरस रहा हूँ। नदी के इस किनारे पर खड़ा हूँ उस किनारे पर मेरे प्राण हैं। बीच में है कुहरे का पुल। जाने का बस एक ही विकल्प है। अपने भ्रम पर इतना यक़ीन करो कि इस पुल में प्राण उतर आएं। यह पुल ईश्वर बन जाए। मैं इसके हृदय में उतरूँ और वहाँ निकलूँ जहाँ मुझे निकलना चाहिए।

#अनूप