-मधुरपट्टी में सालों से होती रही है पुल निर्माण की मांग
दीपक कुमार तिवारी।मुजफ्फरपुर।
यूं तो अब तक नदियों के अनेकों घाटों को आपने देखा होगा लेकिन मुजफ्फरपुर जिले के गायघाट में बागमती नदी का मधुरपट्टी ऐसा घाट है,जहां सदियों से एक पुल निर्माण की मांग लोगों के द्वारा किया जा रहा है और नदी के दोनों किनारों के दर्जनों गांव के लोगों की आवागमन के लिए यहां ‘तार-रस्सी से नाव खेवने’ की व्यवस्था रही है।जुगाड़ टेक्नोलॉजी वाली नाव परिचालन इलाके में चर्चित है। ग्रामीणों का दावा है ऐसा घाट आपने कहीं नहीं देखा होगा।यह नाव न किसी मशीन से चलता है ना किसी ‘करुआर’ के द्वारा चलाया जाता है। यहां रस्सी के सहारे यात्री खुद नाव को खेवते चले जाते हैं और इस पार से उस पार किनारा लग जाता है। हालांकि नाव को व्यवस्थित एवं नियंत्रित करने के लिए ग्रामीणों के द्वारा बजाप्ता एक घटवार को भी यहां पर जिम्मेवारी सौंपी गई है।

ग्रामीणों ने बताया कि गांव वालों के द्वारा प्रत्येक साल एक नई नाव बनवाई जाती है। यह बड़ी नाव होती है। जिसमें गांव के सभी लोगों का आर्थिक सहयोग होता है। नाव को खेवने के लिए एक घटवार को भी यहां ग्रामीणों के सहमति से जिम्मेवारी दी गई है।समयानुसार सरकारी नाव भी उपलब्ध कराए जाते रहे हैं। लोग बताते हैं कि हर बार सांसद एवं विधायक बदलते गए,लेकिन क्षेत्र की लोगों की समस्या एवं मधुरपट्टी में पुल निर्माण की मांग जस की तस रह गयी।लोग बताते हैं कि यूं तो यहां अक्सर नदी पार करने को लेकर अक्सर छोटी-छोटी दुर्घटनाएं होती रही हैं,लेकिन इतनी बड़ी घटना पहली बार हुई है।जिससे पीड़ितों के परिवार एवं रिश्तेदार हीं नहीं समूचा इलाका स्तब्ध है।घाट पर गांव की महिलाओं एवं बुजुर्गों ने रुआंसे भरे अंदाज में बताया कि यहां अधिकारियों एवं जनप्रतिनिधियों के द्वारा हर बार आश्वासन मिलता रहा है,लेकिन जरूरत और जन संख्या लगातार बढ़ती चली गई ।लिहाजा यहां हर समय आवागमन के लिए नाव का परिचालन जारी रहता है।सिर्फ रात के 2 घण्टे के लिये घाट पर परिचालन बन्द रहता है बाकी 22 घण्टों तक यात्रियों का यहां आना-जाना रहता है। इस पार से उस पार तक बड़ी एवं मजबूत रस्सी एवं तार को संयुक्त रूप से बांधकर उसके सहारे से यहां नाव खेवा जाता है।धार बढ़ने या लोड पर घटवार भी नाव पर रहता है,पर आज तो जुल्म हो गया। घटना के बाबजूद लोग मजबूर-बेबस दिखे। मजबूरी की हालत में लोग इस घाट पर नाव से सफर करते रहे। ग्रामीण नाराज भी दिखे और मर्माहत और बेबस भी।












