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‘मंत्री जी’ की ‘मंशा’ पर फिर गया पानी ! जून खत्म होते ही ‘दिल के अरमां आंसुओं में बह गए’, अब भारी गम में जी रहे ‘माननीय’

-‘मंत्री जी’ की ‘मंशा’ पर फिर गया पानी ! जून खत्म होते ही ‘दिल के अरमां आंसुओं में बह गए’, अब भारी गम में जी रहे ‘माननीय’

सम्वाददाता। पटना।

मंत्री जी का सपना ही चकनाचूर हो गया. जिस काम के लिए लंबे वक्त से इंतजार में थे, वो मिशन ऐन वक्त पर मटियामेट हो गया. जून खत्म होने के साथ ही माननीय के सारे अरमां आसूंओं में बह गए. बेचारे मन मसोस कर चुप बैठ गए हैं. मुंह खोंलेगे तो नफा की जगह नुकसान ही होगा. लिहाजा सारा गणित समझ कर चुप रहने में ही अपनी भलाई समझ रहे. अब मंत्री जी इस इंतजार में हैं कि कब विवाद फंसता है.
जून महीना आने के साथ ही अनहोनी भी आई

10 महीने के इंतजार के बाद जून का महीना आया. जून महीने के लिए न सिर्फ मंत्री जी, बल्कि उनका पूरा कुनबा इंतजार में था. जून माह में प्रवेश करने के साथ ही पूरा कुनबा अपने मिशन में सक्रिय हो गया. इसी बीच पहले हफ्ते में ही एक बड़ी अनहोनी हो गई। राजा ने ऐसा स्ट्रोक खेला की सब कुछ एब्नार्मल हो गया. मंत्री ने विभाग को अपने हिसाब से हांकने को लेकर जो प्रपंच रचा था, उनके लिए यह निर्णय एबनार्मल सिचुएशन बना दिया. फिर भी माननीय को लगता था कि महीने के अंत-अंत तक स्थिति नार्मल होगी और वे अपनी मंशा में जरूर कामयाब होंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बड़े साहब के मास्टर स्ट्रोक से मंत्री जी चारो खाने चित्त हो गए.

दरअसल, मंत्री जी का इन दिनों विवादों से गहरा नाता हो गया है. विभाग के अंदर हो या बाहर, हर जगह बयानों-कारनामों की वजह से चर्चा में रहते हैं. बयान ऐसा कि राजा भी नाराज हो जाते हैं. कई मौकों पर राजा ने क्लास भी लगाई, इसके बाद भी नहीं सुधरे. इसके बाद उन्होंने ऐसी चाल चली कि मंत्री जी के लिए न उगलते बन रहा और न निगलते. मंत्री जी क्या करें उन्हें खुद भी समझ में नहीं आ रहा. वे कहां जाएं यह भी पता नहीं चल रहा. अपने नेता के पास जाने से भी कोई फायदा मिलते नहीं दिख रहा. क्यों कि फरियाद का असर होने वाला नहीं.
कड़क हाकिम के आगे विवादित मंत्री हुए पस्त

बता दें, मंत्री जी दूसरी दफे मंत्री बने हैं. इस बार काफी महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी मिली है. मानव रिसोर्स जैसे महत्वपूर्ण काम को धरातल पर उतारने का दायित्व है. जून 2023 से पहले तक विभाग को अपने हिसाब से हांक रहे थे. इस दौरान कई विवादित निर्णय भी लिए. एक जूनियर स्वजातीय अधिकारी को गलत तरीके से बड़े पद का प्रभार दे दिया था. इसके अलावे विभाग के अंदर की बात को भी सार्वजनिक किया था. यह सब कुछ चल रहा था. तभी जून माह में डिपार्टमेंट में नए कड़क साहब आए. साहब के बारे में पूरा सूबा जानता है कि वो काफी कड़क हैं. उनका नाम और काम सचिवालय का जर्रा-जर्रा जानता है. सचिवालय के गलियारे में चर्चा होती है कि मंत्री हो या संतरी…उस कड़क अफसर से दुश्मनी करने की हिम्मत नहीं करता. उनसे कोई गलत पैरवी नहीं करा सकता. विभाग में कड़क अफसर आने के बाद मंत्री जी की हालत पतली हो गई है. क्यों कि मन मुताबिक काम नहीं हो रहा. विभाग के छोटे से लेकर बड़े अधिकारी व कर्मी जान गए हैं कि हमारे मंत्री जी कि औकात क्या है. तभी तो जून महीना बीत गया और मंत्री जी अपने एक भी लोगों को मालदार जगह नहीं दे पाए. जून माह में भी जब मालदार जगह नहीं दे पाए तो फिर माल की प्राप्ति कहां से होगी ? मंत्री जी अंदर ही अंदर घुट रहे हैं. न निगलते बन रहा न उगलते. दर्द ऐसा जिसे किसी को कह भी नहीं सकते. फिर भी मंत्री जी की बॉडी लैंग्वेज समझने वाले लोग बिना कहे समझ गए हैं कि आखिर दर्द कहां हैं…और इस दर्द की दवा क्या है ?