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निबंध : फुआ की दुआरी

#फुआ की दुआरी——

लगभग सात-आठ साल की उमर रही होगी उस बच्चे की, जब फुआ के साथ उसकी नेह की डोर बँध गयी! दो-दो फुआ थीं, दूर देस को एक ही गांव में ब्याही!तब आज की तरह ना तो इतने सहज-सुलभ साधन थे और ना ही इतना सीधा रास्ता कि एक बस पकड़ी और नैहर आ गयीं! हर साल गर्मी के दिनों में या शादी-ब्याह के मौकों पर जब उनका आना होता, वो अपने बागीचे में बैठ उन दोनों की राह अगोरता!”फुआ, रोवो मत! अबकी मैं तुम्हारे गांव पक्का आऊंगा!”–विदाई के समय वो दोनों फुआ की आँखों के लोर पोंछ उन्हें दिलासा देता!
“चल झूठे! तू जब तक बड़ा होगा, क्या पता हमदोनों रहेंगी भी या नहीं!”–फुआलोग मीठी झिड़की दे हँस देती!
समय बीतता गया, बच्चा अब किशोर हो चुका था! घरवाले लाख मना करते रहे कि फुआ का गांव बड़ी दूर है, इलाका भी सुरक्षित नहीं है पर ना उसे मानना था, ना वो माना!
दोनों फुआ की आँखों में पानी छलक आया अपने सबसे छोटे भतीजे को देख! घूम घूम कर सारी बखरी-दुआर और खेत-खलिहान दिखाया! उसकी आँखों में संतुष्टि के भाव थे–“देखा ना, मैं आ ही गया! अब हमेशा आऊंगा!”

पर नियति पर किसका जोर चलता है! बीतते समय के साथ दोनों फुआ हमेशा के लिए छोड़ गयीं उसे! यहाँ तक कि उसके पिता भी!

बच्चा अब आधुनिक मशीनी युग का युवा हो चुका था, बावजूद इसके, उसके मन में फुआ का गांव हमेशा जिंदा है!

आज भी वो नियमित रुप से हर साल जाता है वहाँ! जमीनों के मामले में उसके फुआ की हैसियत इलाके में जमींदार की तरह है! पुरानी बखरी के बगल में बड़ा पक्का आलीशान मकान बन चुका है!

बावजूद इसके, वो फुआ के पुराने खपरैल वाले घर में ठहरता है! लकड़ी का उनके जमाने का वो पुराना लेकिन मजबूत दरवाजा आज भी मौजूद है जिस पर किसिम किसिम की नक्काशी की गयी है! उसके पिता बताते थे कि तब के मशहूर बढ़ई जमुना परसाद ने अपनी सारी कारीगरी उस पर न्यौछावर कर दी थी!

लोग समझ नहीं पाते कि उस कच्चे मकान से उसे क्या लगाव है, और वो बताना भी नहीं चाहता किसी को अपनी भावनायें! कुछ चीजें बस मन के लिए ही होती हैं, पतिव्रता स्त्री की तरह!

वो अपने हाथ फिराता है दरवाजे पर, इस आस में कि कभी फुआ सोते समय इसकी सांकल चढ़ाती होगी! दरवाजे के बगल की कच्ची मिट्टी पर ढूंढ़ता है वो उनके हाथ के निशान, जब वो माता पूजने के बाद छापा लगाती होंगी!

पुराने खपरैल और आँगन को देख उसके मन से आह निकल जाती है! ओह, कभी इसी आँगन में दुलहिन बन कर आयी होगी फुआ! इसी आँगन में कभी अनाज फटकती होगी, कभी सिलबट्टे पर मसाला पीसती होगी!

विदा के वक्त वो अपने फुआ के कमरे को निहारना नहीं भूलता! कभी इसी कमरे में “कोहबर” बना होगा ना उनका! चलते समय उसकी आँखों के कोरों से आँसू छलक पड़ते हैं, लगता है जैसे फुआ कोहबर में चुपचाप बैठी उसे जाते हुए निहार रही हों–

“पेड़वा पे बइठी के गावे रे चिरइया
कि बाबा के भेजो मोरे देस रे….
रहिया अगोरत लोरवा झुरइले
नेहिया के टूटे नाहीं डोर रे….!”

#अनूप