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सरकारी स्कूलों की घटती संख्या और नामांकन ने बढ़ाई चिंता

-सरकारी स्कूलों की घटती संख्या और नामांकन ने बढ़ाई चिंता

नई दिल्ली। देश के कई हिस्सों में छात्रों के प्रदर्शन के दौरान सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की मांग ने शिक्षा व्यवस्था की जमीनी स्थिति पर बहस तेज कर दी है। विरोध और प्रदर्शन के बीच कई राज्यों में सरकारी स्कूलों की सुविधाओं में सुधार की कवायद शुरू हुई है। हालांकि, निजी स्कूलों के लगातार विस्तार के बीच सरकारी स्कूलों का संरक्षण और उन्हें मजबूत करना अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।
आंकड़ों के अनुसार 2018-19 से 2025-26 के बीच देश में करीब 84 हजार सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल कम हुए हैं। इसी अवधि में इन स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या में करीब 1.5 करोड़ की कमी दर्ज की गई। कम नामांकन वाले स्कूलों का दूसरे विद्यालयों में विलय भी स्कूलों की संख्या घटने की प्रमुख वजहों में शामिल बताया जाता है। संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के लिए कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों को आसपास के स्कूलों में मिलाया गया है।
केंद्र सरकार के शिक्षा विभाग के तहत संचालित यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस यानी UDISE+ के आंकड़ों के मुताबिक पिछले सात वर्षों में सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों की संख्या करीब 11 लाख से घटकर लगभग 10 लाख रह गई है। हालांकि स्कूलों की संख्या में कमी को केवल विद्यालयों के बंद होने से जोड़ना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। स्कूलों के विलय और संसाधनों के पुनर्गठन का भी इसमें योगदान है। इसके बावजूद सरकारी शिक्षा व्यवस्था की दिशा और प्राथमिकताओं पर गंभीर चर्चा की जरूरत है।
राज्यों के शिक्षा बजट पर नजर डालें तो बिहार, उत्तराखंड, राजस्थान और छत्तीसगढ़ ने 2018-19 से औसतन अपने बजट का 15 प्रतिशत से अधिक हिस्सा शिक्षा क्षेत्र को दिया है। बिहार करीब 18.7 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ आगे बताया गया है। इसके बाद उत्तराखंड 17.4 प्रतिशत, राजस्थान 16.9 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ 16.2 प्रतिशत के साथ हैं। बिहार में 2018-19 की तुलना में शिक्षा बजट की हिस्सेदारी में करीब 5.2 प्रतिशत की वृद्धि बताई गई है। राजस्थान में यह वृद्धि 3.5 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ में 0.3 प्रतिशत रही।
बुनियादी सुविधाओं की बात करें तो सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल कई मामलों में निजी स्कूलों से पीछे हैं। विशेष रूप से कंप्यूटर और इंटरनेट जैसी डिजिटल सुविधाओं की उपलब्धता चिंता का विषय बनी हुई है। हालांकि पुस्तकालय जैसी सुविधाओं के मामले में कई सरकारी स्कूल निजी संस्थानों से बेहतर स्थिति में भी दिखाई देते हैं।


ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों के कमजोर शैक्षणिक परिणाम भी अभिभावकों के निजी स्कूलों की ओर रुख करने की एक वजह माने जाते हैं। शिक्षा की चुनौती केवल स्कूल भवन, स्मार्ट क्लास या डिजिटल उपकरण उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों की वास्तविक सीखने की क्षमता और शिक्षण की गुणवत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
एनजीओ प्रथम की वार्षिक शिक्षा स्थिति रिपोर्ट यानी ASER के आंकड़े ग्रामीण सरकारी स्कूलों में बच्चों के सीखने के स्तर को लेकर सवाल खड़े करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण सरकारी स्कूलों में तीसरी कक्षा के करीब तीन-चौथाई बच्चे दूसरी कक्षा के स्तर का पाठ पढ़ने में सक्षम नहीं हैं। गणित में भी तीसरी और पांचवीं कक्षा के बच्चों में घटाव और भाग जैसी बुनियादी गणनाओं को लेकर कमजोरी सामने आती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 66 प्रतिशत बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, जबकि शहरी इलाकों में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का अनुपात करीब 30 प्रतिशत बताया गया है। ऐसे में ग्रामीण बच्चों के लिए सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता सीधे उनके भविष्य से जुड़ जाती है।
योग्य शिक्षकों की पर्याप्त उपलब्धता, मजबूत स्कूल भवन, पर्याप्त कक्षाएं, बच्चों के लिए सुरक्षित और शिक्षाप्रद वातावरण तथा बेहतर पाठ्यक्रम जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी किए बिना गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना मुश्किल है।
सरकारी स्कूल देश की शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ हैं, खासकर ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के लिए। ऐसे में स्कूलों की घटती संख्या और नामांकन में गिरावट को केवल आंकड़ों के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरत इस बात की है कि स्कूलों में शिक्षकों की उपलब्धता, संसाधन, डिजिटल सुविधाएं और सबसे बढ़कर बच्चों की सीखने की क्षमता में सुधार पर ध्यान दिया जाए। निजी स्कूलों का विस्तार अभिभावकों को अतिरिक्त विकल्प जरूर देता है, लेकिन इससे सरकारी शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी कम नहीं होती। मजबूत सरकारी स्कूल ही बड़ी संख्या में बच्चों को सुलभ, समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने की आधारशिला बन सकते हैं।