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व्यक्ति, परिवार, समाज व राष्ट्र रक्षा का आह्वान करता है रक्षाबंधन का त्योहार : सुशील पांडेय

-व्यक्ति, परिवार, समाज व राष्ट्र रक्षा का आह्वान करता है रक्षाबंधन का त्योहार : सुशील पांडेय

मोतिहारी, राजन द्विवेदी। स्नान-दान सहित श्रावणी पूर्णिमा एवं रक्षाबंधन का पावन पर्व 28 अगस्त शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस वर्ष 27 अगस्त गुरुवार को दिन में 8:31 बजे से पूर्णिमा तिथि प्रारंभ होगी, जो 28 अगस्त शुक्रवार को दिन में 9:18 बजे तक रहेगी। शुक्रवार को सूर्योदय पूर्णिमा तिथि में होने के कारण उदया तिथि को मानते हुए पूरे दिन अपनी-अपनी परंपरा के अनुसार रक्षाबंधन का पर्व मनाना उचित होगा। इसी दिन वेद की विभिन्न शाखाओं के अनुयायी एक साथ श्रावणी उपाकर्म भी विधिवत संपन्न करेंगे।
उक्त जानकारी महर्षिनगर स्थित आर्षविद्या शिक्षण प्रशिक्षण सेवा संस्थान-वेद विद्यालय के प्राचार्य सुशील कुमार पाण्डेय ने दी। उन्होंने कहा कि रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र की रक्षा के लिए जागरूक होने का संदेश भी देता है। यह पर्व आत्मबोध एवं आत्मज्ञान का दिन है।


प्राचार्य पाण्डेय ने रक्षाबंधन से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं का उल्लेख करते हुए बताया कि प्राचीन काल में देवासुर संग्राम के दौरान देवताओं की पराजय के बाद इंद्र ने देवगुरु बृहस्पति से मार्गदर्शन मांगा था। इंद्राणी ने श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के अवसर पर विधिपूर्वक रक्षासूत्र तैयार कर इंद्र को स्वस्तिवाचन के साथ बंधवाने की सलाह दी। इसके बाद इंद्र ने रक्षाविधान एवं स्वस्तिवाचन पूर्वक रक्षाबंधन करवाया और युद्ध में विजय प्राप्त की। मान्यता है कि तभी से रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाने लगा।
उन्होंने बताया कि भगवान कृष्ण के हाथ में चोट लगने पर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर उनके हाथ में बांधा था। श्रीकृष्ण ने इसे रक्षासूत्र मानते हुए द्रौपदी की रक्षा का दायित्व निभाया। इसी तरह मेवाड़ की रानी कर्णावती द्वारा मुगल शासक हुमायूं को राखी भेजकर चित्तौड़ की रक्षा के लिए सहायता मांगने की कथा भी रक्षाबंधन से जुड़ी ऐतिहासिक मान्यताओं में उल्लेखित है।
प्राचार्य ने कहा कि रक्षाबंधन के दिन बहन भाई की कलाई पर रक्षासूत्र बांधती है और भाई उसकी रक्षा का संकल्प लेता है। इसके अलावा गुरु अपने शिष्यों को, ब्राह्मण अपने यजमानों को और प्रजा अपने राजा को रक्षासूत्र बांधने की परंपरा भी रही है। पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से वृक्षों को रक्षासूत्र बांधने की परंपरा भी इस पर्व के व्यापक संदेश को दर्शाती है। इसका उद्देश्य प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा के प्रति लोगों को जागरूक करना है।