-पितृ तर्पण और श्राद्ध को देव पूजन की तरह ही आवश्यक व पुण्यफलदायक मानता है शास्त्र
मोतिहारी, राजन द्विवेदी। सनातन हिंदू धर्म में पितृ तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध को देव पूजन की तरह ही आवश्यक एवं पुण्यफलदायक माना गया है। भाद्रपद शुक्लपक्ष की पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक 16 दिनों का महालया मनाया जाता है। इस वर्ष 26 सितंबर शनिवार से महालया प्रारंभ होगा। इस दिन अगस्त्य ऋषि के निमित्त तर्पण किया जाएगा।
पितृपक्ष में श्राद्ध के लिए मध्याह्न व्यापिनी तिथि को मान्य माना जाता है। इस वर्ष पितरों के तर्पण, श्राद्ध आदि का पखवारा 27 सितंबर रविवार से शुरू होगा। स्नान-दान सहित सर्वपितृ अमावस्या और पितृ विसर्जन 10 अक्टूबर शनिवार को होगा।

उक्त जानकारी महर्षिनगर स्थित आर्षविद्या शिक्षण प्रशिक्षण सेवा संस्थान-वेद विद्यालय के प्राचार्य सुशील कुमार पाण्डेय ने दी। उन्होंने बताया कि शास्त्रीय मान्यता के अनुसार देवताओं की पूजा से पहले पितरों को प्रसन्न करना कल्याणकारी माना गया है। पितृपक्ष में पूर्वजों की पुण्यतिथि यानी मृत्यु तिथि पर उनकी आत्मा की संतुष्टि के लिए किया जाने वाला श्राद्ध उनके प्रति श्रद्धांजलि है।
प्राचार्य पाण्डेय ने बताया कि पितृपक्ष के प्रथम दिन से तर्पण प्रारंभ कर जिस तिथि को पूर्वज का निधन हुआ हो, उसी तिथि को उनके निमित्त पिंडदान और श्राद्ध करना चाहिए। जिन लोगों को अपने पितरों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है, उनके लिए अमावस्या तिथि को श्राद्ध करने का विधान बताया गया है।
उन्होंने कहा कि शास्त्रीय मान्यता में आश्विन मास के कृष्णपक्ष को पितृपक्ष माना गया है। इस दौरान पूर्वजों के निमित्त तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध करने की परंपरा है। मान्यता है कि इससे पितृगण तृप्त होकर अपने वंशजों को सुख-समृद्धि, संतति और मंगलमय जीवन का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।












