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कभी बिहार-झारखंड का सबसे बड़ा पशु हाट था यादव नगर टंडवा, अब बदहाली और पानी संकट से जूझ रहा बाजार

-कभी बिहार-झारखंड का सबसे बड़ा पशु हाट था यादव नगर टंडवा, अब बदहाली और पानी संकट से जूझ रहा बाजार

चतरा। प्रतापपुर प्रखंड के टंडवा स्थित यादव नगर बाजार कभी पूरे इलाके की पहचान माना जाता था। वर्ष 1984 में स्वर्गीय विक्रम सहदेव अंगार द्वारा शुरू किया गया यह बाजार एक समय बिहार-झारखंड के बड़े पशु बाजारों में गिना जाता था। हर गुरुवार को लगने वाले इस हाट में दूर-दराज के जिलों और दूसरे राज्यों से व्यापारी पशुओं की खरीद-बिक्री के लिए पहुंचते थे। उस दौर में यादव नगर बाजार ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मजबूत केंद्र बन चुका था।

बाजार की सबसे बड़ी पहचान यहां लगने वाला पशु हाट था। बैल, गाय, भैंस समेत अन्य मवेशियों की खरीदारी के लिए भारी संख्या में व्यापारी पहुंचते थे। बाजार में इतनी भीड़ होती थी कि आसपास की सड़कें तक जाम हो जाती थीं। स्थानीय दुकानदारों की अच्छी आमदनी होती थी और ग्रामीणों को भी रोजगार व व्यापार का बड़ा सहारा मिलता था। यादव नगर बाजार को उस समय टंडवा की शान माना जाता था।

लेकिन समय के साथ इस बाजार की रौनक फीकी पड़ती चली गई। अब यहां पहले जैसी भीड़ नहीं जुटती। जहां कभी दूसरे राज्यों के व्यापारी पहुंचते थे, वहां अब बाजार केवल आसपास के गांवों और प्रखंडों तक सीमित होकर रह गया है। पशुओं की खरीद-बिक्री में भी भारी गिरावट आई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि बाजार के विकास और मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था को लेकर कभी गंभीर पहल नहीं की गई।

वर्तमान में बाजार की सबसे बड़ी समस्या पानी की किल्लत बन चुकी है। बाजार आने वाले व्यापारियों और ग्रामीणों को पेयजल के लिए काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। गर्मी के दिनों में हालात और बदतर हो जाते हैं। बाजार परिसर में पानी की समुचित व्यवस्था नहीं होने से लोगों को दूर-दूर तक भटकना पड़ता है। पशुओं के लिए भी पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं हो पाता, जिससे व्यापारियों की मुश्किलें बढ़ जाती हैं।

स्थानीय दुकानदारों और ग्रामीणों का कहना है कि यदि बाजार में पेयजल, शौचालय, शेड और साफ-सफाई जैसी बुनियादी सुविधाएं विकसित की जाएं तो यादव नगर बाजार फिर से अपनी पुरानी पहचान हासिल कर सकता है। लोगों का मानना है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की पहल से इस ऐतिहासिक बाजार को दोबारा व्यवस्थित और आकर्षक बनाया जा सकता है।

चार दशक पहले जिस बाजार ने इलाके की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी थी, वही बाजार आज बुनियादी सुविधाओं के अभाव में अपनी चमक खोता नजर आ रहा है। अब लोगों की उम्मीदें प्रशासन पर टिकी हैं कि आखिर कब इस ऐतिहासिक बाजार की सुध ली जाएगी।