-ईंधन बचाओ की अपील और वीआईपी काफिलों की सियासत
आलेख: दीपक कुमार तिवारी।
देश इस समय वैश्विक ऊर्जा संकट के दौर से गुजर रहा है। पेट्रोल और डीज़ल की बढ़ती कीमतें सिर्फ आम आदमी की जेब पर असर नहीं डाल रहीं, बल्कि सरकारों के सामने भी ऊर्जा संरक्षण की बड़ी चुनौती खड़ी कर रही हैं। ऐसे समय में प्रधानमंत्री Narendra Modi ने देशवासियों से अपील की कि अनावश्यक यात्राओं से बचें, सार्वजनिक परिवहन अपनाएं और ईंधन की खपत कम करें। यह अपील सादगी, जिम्मेदारी और संसाधनों के संतुलित उपयोग का संदेश देती है।
लेकिन सवाल तब उठता है जब यही संदेश सत्ता के गलियारों में धुंधला पड़ता दिखाई देता है। बिहार की राजधानी पटना में आयोजित कैबिनेट बैठक के दौरान मंत्रियों और अधिकारियों के भारी-भरकम काफिलों ने एक बार फिर इस बहस को हवा दे दी कि क्या ईंधन बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ आम जनता की है?
सड़कों पर दौड़ती वीआईपी गाड़ियों की लंबी कतारें आम लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गईं। मुख्यमंत्री Samrat Choudhary के काफिले में सुरक्षा, जैमर, एम्बुलेंस और अन्य वाहनों को मिलाकर करीब 19 गाड़ियों के शामिल होने का दावा किया गया। दूसरी ओर कई अन्य मंत्रियों के काफिलों में भी 2 से 4 गाड़ियों तक का मूवमेंट देखने को मिला। मंत्री Santosh Kumar Suman के काफिले में एक कथित खाली गाड़ी की चर्चा ने इस मुद्दे को और राजनीतिक रंग दे दिया।
बेशक वीआईपी सुरक्षा लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। मुख्यमंत्री, मंत्री और बड़े अधिकारियों की सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन सवाल यह है कि क्या सुरक्षा और सादगी के बीच संतुलन संभव नहीं है? क्या हर बार इतने बड़े काफिलों की आवश्यकता होती है? और यदि प्रधानमंत्री स्वयं ऊर्जा बचत की अपील कर रहे हैं, तो क्या राज्य स्तर पर उसके पालन की नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती?

दरअसल, राजनीति में संदेश सिर्फ भाषणों से नहीं, बल्कि व्यवहार से भी जाता है। जब जनता देखती है कि उसे ईंधन बचाने, सार्वजनिक परिवहन अपनाने और खर्च कम करने की सलाह दी जा रही है, जबकि सत्ता पक्ष के काफिले लगातार बड़े होते जा रहे हैं, तो स्वाभाविक रूप से भरोसे में कमी आती है। लोकतंत्र में जनता केवल शब्द नहीं, बल्कि उदाहरण भी देखती है।
यह मुद्दा केवल गाड़ियों की संख्या का नहीं है। यह उस मानसिकता का प्रतीक बनता जा रहा है, जहां मंचों पर सादगी की बात होती है और जमीन पर शक्ति प्रदर्शन की तस्वीर दिखाई देती है। आम नागरिक ट्रैफिक, महंगे ईंधन और सीमित संसाधनों से जूझता है, जबकि वीआईपी मूवमेंट के दौरान सड़कें खाली कराई जाती हैं और ईंधन की बड़ी खपत सामान्य बात मान ली जाती है।
हालांकि कुछ नेताओं ने काफिले कम करने की बात कही है, जो सकारात्मक संकेत माना जा सकता है। लेकिन जरूरत केवल बयान की नहीं, बल्कि व्यवस्था में बदलाव की है। यदि सरकारें सचमुच ऊर्जा संरक्षण का संदेश मजबूत करना चाहती हैं, तो इसकी शुरुआत सत्ता के शीर्ष स्तर से होनी चाहिए। कम गाड़ियों वाले काफिले, इलेक्ट्रिक वाहनों का अधिक उपयोग और अनावश्यक मूवमेंट में कटौती जैसे कदम जनता के बीच मजबूत संदेश दे सकते हैं।
आज देश को केवल अपीलों की नहीं, उदाहरणों की जरूरत है। क्योंकि जनता वही ज्यादा स्वीकार करती है, जिसे वह सत्ता के व्यवहार में देखती है। “ईंधन बचाओ” का संदेश तभी प्रभावी होगा, जब सादगी सिर्फ भाषणों में नहीं, बल्कि सत्ता के काफिलों में भी दिखाई दे।











