-औराई-कटरा में पांच हजार हेक्टेयर खेती पर गुरहन घास का संकट
-बायोचार से उर्वरा शक्ति लौटाने की तैयारी
मुजफ्फरपुर। औराई-कटरा इलाके में कभी लहलहाने वाले खेत अब जंगली गुरहन घास के घने फैलाव से प्रभावित हैं। बागमती नदी के तटबंधीय क्षेत्र में उगने वाली इस घास का फैलाव करीब 19 किलोमीटर क्षेत्र में हो चुका है और इससे लगभग पांच हजार हेक्टेयर खेती योग्य भूमि प्रभावित बताई जा रही है। गुरहन के उन्मूलन के साथ प्रभावित जमीन की उर्वरा शक्ति लौटाने के लिए जिला कृषि विभाग ने पहल शुरू की है।
इसके तहत गुरहन घास को विशेष मशीन की मदद से जलाकर बायोचार तैयार किया जाएगा और इसका इस्तेमाल प्रभावित खेतों में किया जाएगा। जिला कृषि विभाग इस योजना को आत्मा (कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन अभिकरण) के माध्यम से आगे बढ़ाएगा। तकनीक और प्रक्रिया की जानकारी लेने के लिए महात्मा गांधी ग्रामीण औद्योगिकी संस्थान, वर्धा से संपर्क किया जा रहा है।

जिला कृषि पदाधिकारी भारत भूषण ने बताया कि जिले में गुरहन गंभीर समस्या बन चुकी है। इसके कारण बड़ी मात्रा में खेती योग्य भूमि प्रभावित हुई है। कई स्थानों पर घास के घने फैलाव के कारण जंगली जानवरों का बसेरा भी बन गया है। आत्मा के कृषि विज्ञानियों के सहयोग से प्रभावित भूमि को दोबारा खेती योग्य बनाने की दिशा में काम किया जा रहा है।
आत्मा के सहायक परियोजना निदेशक बिनोद सिंह ने बताया कि बायोचार मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने में उपयोगी माना जाता है। यह मिट्टी में नमी बनाए रखने में मदद करता है और उर्वरा शक्ति बढ़ाने में सहायक होता है। योजना के तहत धीरे-धीरे गुरहन हटाकर उससे तैयार बायोचार को खेतों में डालने का प्रयास किया जाएगा। इससे गुरहन के फैलाव को नियंत्रित करने के साथ प्रभावित भूमि की उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
बताया गया कि वर्ष 2007 की बाढ़ के बाद बांध निर्माण के दौरान बाहर से लाई गई मिट्टी के साथ गुरहन के बीज भी इलाके में पहुंचे थे। शुरुआत में यह घास महज एक कट्ठा जमीन में थी। गर्मी के मौसम में बीज हवा के साथ आसपास फैलते गए और धीरे-धीरे इसका दायरा बढ़ता चला गया। वर्तमान में करीब 19 किलोमीटर क्षेत्र और पांच हजार हेक्टेयर भूमि इसके प्रभाव में है। गुरहन के कारण खेती प्रभावित होने के साथ फसलों को जंगली जानवरों से भी नुकसान पहुंच रहा है।












