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मैं मिला हूँ उन लड़कों से…

-मैं मिला हूँ उन लड़कों से…

आलेख: अनूपनारायण।
मैं मिला हूँ उन लड़कों से, जो घर से निकलते तो अपने सपनों के साथ हैं, लेकिन समय की कठोर मार के आगे अपने सपनों को धीरे-धीरे तह करके किसी पुराने बैग में रख देते हैं। वे अपने लिए नहीं, अपनों के लिए जीना सीख लेते हैं। कुछ लड़के घर छोड़ते ही इसलिए हैं कि माता-पिता की उम्मीदों को पंख दे सकें। मगर उन उम्मीदों को पूरा करते-करते वे अपना बचपन, अपनी हँसी और अपना लड़कपन कहीं पीछे छोड़ आते हैं।
उन्हें भी घर की याद आती है। माँ के हाथ का खाना, पिता की डाँट, भाई-बहनों की शरारतें और गाँव की गलियाँ उन्हें भी रातों में बेचैन करती हैं। मगर वे रोते नहीं। शायद इसलिए नहीं कि उन्हें दर्द नहीं होता, बल्कि इसलिए कि समाज ने उन्हें सिखा दिया है—”लड़के रोते नहीं हैं।”
मैं मिला हूँ उन लड़कों से, जो अपनी थकान को बड़े बालों और बढ़ी हुई दाढ़ी के पीछे छिपा लेते हैं। लेकिन समय किसी का साथ नहीं देता। एक दिन बालों में सफेदी उतरने लगती है और दाढ़ी में उम्र दिखाई देने लगती है। जैसे उनके सपने अधूरे रह जाते हैं, वैसे ही उनका चेहरा भी समय की कहानी कहने लगता है।
मैं मिला हूँ उन लड़कों से, जो किताबों में खो गए हैं; जो मशीनों के नीचे सो गए हैं; जो कंप्यूटर स्क्रीन के सामने अपनी आँखों की नमी छिपा रहे हैं; जो फाइलों के ढेर में खुद को तलाशते-तलाशते खुद ही कहीं गुम हो गए हैं। फिर भी जब दुनिया से मिलते हैं, तो मुस्कुरा देते हैं। गुनगुना देते हैं। दुनिया उन्हें बेपरवाह समझती है, जबकि उनके भीतर जिम्मेदारियों का एक पूरा पहाड़ खड़ा होता है।


मैं मिला हूँ उन लड़कों से, जिनके सपनों में अपने लिए बहुत कम जगह बची होती है। वे एक ऐसी दौड़ में भाग रहे होते हैं, जिसकी मंज़िल उन्होंने खुद कभी चुनी ही नहीं। उनका सपना तो बस इतना-सा था कि दोस्त की सेकंड हैंड स्प्लेंडर की पिछली सीट पर अपनी महबूबा को बैठाकर लंबी सड़क पर निकल पड़ें। सफर का असली आनंद बाइक चलाने में नहीं, बल्कि साइड मिरर में उसके उड़ते बालों को देखने में था।
उनके लिए मोटरसाइकिल सिर्फ एक गाड़ी नहीं, एक सपना थी। मगर जिम्मेदारियों की धूल उस सपने पर इतनी जम गई कि वे खुद से मिलते-मिलते खुद से बहुत दूर निकल गए।
मैं मिला हूँ उन लड़कों से, जो अपने लिए जीने से पहले दूसरों के लिए जीना चाहते हैं।
मैं मिला हूँ उन लड़कों से, जिनकी मुस्कान अक्सर झूठी होती है। जिन्हें लोग निकम्मा, गैर-जिम्मेदार या लापरवाह कह देते हैं। जिनके कपड़ों से पसीने की गंध आती है, क्योंकि कई-कई दिनों तक उन्हें खुद का ख्याल रखने का भी समय नहीं मिलता। वे मंदिरों में कम दिखाई देते हैं। ऐसा नहीं कि उन्हें भगवान पर विश्वास नहीं, बल्कि इसलिए कि वे दूसरों की दुआ बनने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि अपने लिए कुछ माँगना ही भूल जाते हैं।
वे हाथों में ग्रीस लगाए, उँगलियों में फाइलों की धूल समेटे, कंप्यूटर स्क्रीन पर टकटकी लगाए, अपने गाँव और अपनी मिट्टी से सैकड़ों किलोमीटर दूर, रात के 11:40 बजे किराए के कमरे में सेकंड हैंड स्प्लेंडर बाहर खड़ी करके मैगी या चावल बनाकर खा लेते हैं। उसी साधारण भोजन के साथ वे अपने अधूरे सपनों को भी निगल जाते हैं।
दुनिया उन्हें सिर्फ नौकरी करते हुए लड़के के रूप में देखती है, लेकिन मैं जानता हूँ कि वे अपने कंधों पर पूरे परिवार का भविष्य ढो रहे हैं।
मैं सचमुच मिला हूँ उन लड़कों से… जो टूटते हर रोज़ हैं, लेकिन बिखरते कभी नहीं। जो थकते हर शाम हैं, लेकिन अगली सुबह फिर खड़े हो जाते हैं। जो अपने सपनों का बलिदान देकर अपनों की मुस्कान खरीदते हैं। शायद इसलिए दुनिया उन्हें साधारण लड़के कहती है, लेकिन मेरे लिए वे हर दिन अपने जीवन का सबसे कठिन युद्ध लड़ने वाले नायक हैं।
मैं मिला हूँ उन लड़कों से… और उन्हें देखकर समझ पाया कि सबसे भारी बोझ सामान का नहीं, जिम्मेदारियों का होता है।