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दिल्ली होटल अग्निकांड और मुजफ्फरपुर अस्पताल हादसा: क्या हम हर त्रासदी के बाद भी सबक नहीं सीख रहे?

-दिल्ली होटल अग्निकांड और मुजफ्फरपुर अस्पताल हादसा: क्या हम हर त्रासदी के बाद भी सबक नहीं सीख रहे?

आलेख : दीपक कुमार तिवारी।

भारत में आग की घटनाएं अब केवल दुर्घटनाएं नहीं रह गई हैं, बल्कि वे प्रशासनिक लापरवाही, सुरक्षा मानकों की अनदेखी और जवाबदेही के संकट का आईना बनती जा रही हैं। एक तरफ दिल्ली के मालवीय नगर स्थित होटल में भीषण आग लगने से 21 लोगों की मौत हो गई, वहीं दूसरे दिन बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित प्रसाद अस्पताल के आईसीयू में लगी आग ने कई परिवारों को हमेशा के लिए उजाड़ दिया। इन दोनों घटनाओं ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि आखिर देश में अग्नि सुरक्षा नियम केवल कागजों तक ही क्यों सीमित रह जाते हैं।

दिल्ली के होटल अग्निकांड में जांच के दौरान सामने आया कि जिस भवन को मात्र छह कमरों की अनुमति थी, उसमें 25 कमरे संचालित किए जा रहे थे। कई सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया गया था। आग लगने के बाद लोगों को जान बचाने के लिए खिड़कियों से कूदना पड़ा और स्थानीय लोगों को गद्दे बिछाकर उनकी जान बचानी पड़ी। घटना के बाद होटल मालिक को गिरफ्तार किया गया और व्यापक जांच शुरू हुई।

उधर मुजफ्फरपुर के प्रसाद अस्पताल में आईसीयू में लगी आग ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। प्रारंभिक जांच में सामने आया कि 13 बेड की क्षमता वाले आईसीयू में 15 मरीज रखे गए थे। अस्पताल के रिकॉर्ड सिस्टम के जल जाने से मरीजों की जानकारी तक प्रभावित हो गई। परिजनों के आरोप हैं कि हादसे के दौरान अस्पताल कर्मियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में रही।

इन दोनों हादसों को गौर से देखें तो कई समान बिंदु सामने आते हैं।

पहला, दोनों जगहों पर क्षमता और सुरक्षा मानकों की अनदेखी दिखाई देती है। दिल्ली में होटल निर्धारित सीमा से कहीं अधिक संचालित किया जा रहा था, जबकि मुजफ्फरपुर में आईसीयू क्षमता से अधिक मरीजों को रखा गया था।

दूसरा, आपातकालीन निकासी की व्यवस्था प्रभावी नहीं थी। दिल्ली में लोगों को जान बचाने के लिए भवन से कूदना पड़ा, जबकि मुजफ्फरपुर में धुएं से घिरे मरीजों को सुरक्षित निकालने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

तीसरा, दोनों घटनाओं ने यह उजागर किया कि नियमित निरीक्षण और अनुपालन की व्यवस्था कमजोर है। यदि समय पर सुरक्षा ऑडिट और कड़ी निगरानी होती, तो शायद इन हादसों की भयावहता कम हो सकती थी।

होटल और अस्पताल दोनों ऐसे स्थान हैं जहां लोग अपनी सुरक्षा की उम्मीद लेकर आते हैं। होटल में ठहरे लोग भवन की संरचना या निकासी मार्ग से परिचित नहीं होते, जबकि अस्पतालों में मरीजों की शारीरिक स्थिति ऐसी नहीं होती कि वे आपदा की स्थिति में स्वयं को बचा सकें।

मुजफ्फरपुर हादसे में 95 वर्षीय राधा देवी का उदाहरण चर्चा में है, जिन्होंने धुएं के बीच अपना ऑक्सीजन मास्क हटाकर और सलाइन निकालकर स्वयं बाहर निकलने का साहस दिखाया। लेकिन हर मरीज ऐसा नहीं कर सकता। यही कारण है कि अस्पतालों में अग्नि सुरक्षा मानक और भी अधिक कठोर होने चाहिए।

हर बड़े हादसे के बाद जांच समिति बनती है, रिपोर्ट तैयार होती है और कुछ समय बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल जांच और मुआवजा पर्याप्त है?

जब किसी अस्पताल में क्षमता से अधिक मरीज भर्ती किए जाते हैं, जब किसी होटल में अनुमति से कई गुना अधिक कमरे संचालित किए जाते हैं, जब अग्निशमन उपकरण या निकासी मार्ग मानकों के अनुरूप नहीं होते, तब यह केवल दुर्घटना नहीं बल्कि संस्थागत विफलता बन जाती है।

इन दोनों घटनाओं से सबक लेते हुए कुछ ठोस कदम जरूरी हैं।जैसे- सभी अस्पतालों, होटलों,विवाह भवनों और बहुमंजिला व्यावसायिक भवनों का नियमित फायर सेफ्टी ऑडिट करना।क्षमता से अधिक संचालन पर तत्काल दंडात्मक कार्रवाई।

फायर एनओसी की वार्षिक समीक्षा हो।अस्पतालों और होटलों में अनिवार्य मॉक ड्रिल होनी चाहिए।आपदा की स्थिति में जिम्मेदार अधिकारियों और संस्थान प्रबंधन की व्यक्तिगत जवाबदेही तय करना चाहिए।निरीक्षण व्यवस्था को डिजिटल और पारदर्शी बनाना होगा।

निष्कर्षतः दिल्ली होटल अग्निकांड और मुजफ्फरपुर अस्पताल हादसा दो अलग-अलग शहरों की घटनाएं हैं, लेकिन इनके पीछे की कहानी एक जैसी है—सुरक्षा नियमों की अनदेखी, कमजोर निगरानी और जवाबदेही का अभाव। जब तक सुरक्षा को कागजी औपचारिकता की बजाय संस्थागत संस्कृति का हिस्सा नहीं बनाया जाएगा, तब तक ऐसी त्रासदियां बार-बार सामने आती रहेंगी।

इन हादसों में खोई हुई जिंदगियां केवल आंकड़े नहीं हैं। वे उन परिवारों के सपने, उम्मीदें और भविष्य थे, जिन्हें शायद बेहतर व्यवस्था और समय पर सतर्कता बचा सकती थी।