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माओवादी हिंसा के 337 पीड़ित परिवारों को तलाश रही बिहार सरकार

-माओवादी हिंसा के 337 पीड़ित परिवारों को तलाश रही बिहार सरकार

-मुआवजा दिलाने के लिए सभी जिलों से मांगी रिपोर्ट

मुजफ्फरपुर।दीपक कुमार तिवारी। वर्षों तक माओवादी हिंसा का दंश झेलने वाले परिवारों के जख्मों पर अब सरकार मरहम लगाने की तैयारी में है। देश के माओवाद मुक्त होने के बाद बिहार सरकार उन पीड़ित परिवारों को खोज रही है, जिनके परिजन माओवादी हमलों में मारे गए थे और जिन्हें अब तक निर्धारित मुआवजा नहीं मिल सका है। इसके लिए गृह विभाग ने राज्य के 24 जिलों के 337 पीड़ित परिवारों की सूची जारी कर सभी जिलाधिकारियों से मुआवजा वितरण की स्थिति पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।

गृह विभाग के अनुसार आतंकवादी, सांप्रदायिक और नक्सली हिंसा के नागरिक पीड़ितों को सहायता प्रदान करने वाली केंद्रीय योजना (सीएसएसीवी) के तहत प्रभावित परिवारों को आर्थिक सहायता दी जाती है। विभाग को जानकारी मिली है कि सूची में शामिल कई परिवारों को अब तक मुआवजा नहीं मिल पाया है। ऐसे में संबंधित जिलों को निर्देश दिया गया है कि वे पात्र परिवारों की पहचान कर प्रस्ताव भारत सरकार और गृह विभाग को भेजें, ताकि उन्हें सहायता राशि उपलब्ध कराई जा सके।

सूची में गया और औरंगाबाद जिले के सर्वाधिक पीड़ित परिवार शामिल हैं, जबकि मुजफ्फरपुर जिले के सात परिवार भी इसमें दर्ज हैं। गृह विभाग के संयुक्त सचिव द्वारा जारी पत्र में सभी जिलाधिकारियों से मुआवजा भुगतान की समीक्षा कर शीघ्र रिपोर्ट भेजने को कहा गया है।

मुजफ्फरपुर के देवरिया थाना क्षेत्र में 23 अप्रैल 2009 को हुए चर्चित माओवादी हमले की पीड़ा आज भी कई परिवारों के मन में ताजा है। कर्पूरी चौक स्थित वैशाली नहर पुल पर माओवादियों ने केन बम विस्फोट कर पारू प्रखंड के शिक्षा प्रसार पदाधिकारी सुनील कुमार सिंह समेत पांच पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी थी। घटना के बाद उनके बड़े पुत्र सत्यम कुमार सिंह को शिक्षा विभाग में नौकरी मिली, लेकिन परिवार को लंबे समय तक संघर्ष करना पड़ा। पति की मौत का सदमा झेल रहीं उनकी पत्नी गुड्डी देवी का भी तीन वर्ष पूर्व निधन हो गया।

इसी तरह देवरिया थाना क्षेत्र के विशुनपुर सरैया चौक पर सामाजिक कार्यकर्ता रामचंद्र सिंह उर्फ भोला सिंह की माओवादियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। उनके बड़े पुत्र विवेक कुमार बताते हैं कि पिता की हत्या के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। सरकार से मिली पांच लाख रुपये की सहायता राशि का बड़ा हिस्सा बीमार मां के इलाज में खर्च हो गया, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। तीन वर्ष पूर्व मां का भी निधन हो गया। वर्तमान में दोनों भाई अपने परिवार का भरण-पोषण व्यवसाय के माध्यम से कर रहे हैं।

सरकार का मानना है कि माओवादी हिंसा के कारण प्रभावित परिवारों को न्याय और सहायता मिलनी चाहिए। इसी उद्देश्य से राज्यभर में ऐसे परिवारों की पहचान कर उन्हें लंबित मुआवजा राशि उपलब्ध कराने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है।

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