-फुलहर में मिली देवी तारा की प्रतिमा ने खोले मिथिला के बौद्ध इतिहास के नए द्वार
मुजफ्फरपुर, दीपक कुमार तिवारी।
मिथिला की धरती पर भगवान बुद्ध और देवी तारा की उपासना से जुड़े ऐतिहासिक साक्ष्य लगातार सामने आ रहे हैं। मधुबनी जिले के हरलाखी प्रखंड स्थित राम-जानकी मिलन स्थल के रूप में प्रसिद्ध फुलहर के बागतड़ाग पोखर से तीन दिन पूर्व देवी तारा की खंडित प्रतिमा तथा सुनहरे रंग के अभिलेख का अवशेष मिलने के बाद इतिहासकारों और शोधकर्ताओं में नई चर्चा शुरू हो गई है।
इतिहासकार डॉ. शिवकुमार मिश्र के अनुसार यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पूर्व भी मधुबनी, दरभंगा, सहरसा, सुपौल, बेगूसराय, वैशाली और चंपारण सहित मिथिला के कई क्षेत्रों से भगवान बुद्ध एवं देवी तारा की मूर्तियां, अभिलेख और अन्य अवशेष प्राप्त हो चुके हैं। ये सभी साक्ष्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि मिथिला क्षेत्र में बौद्ध परंपरा का व्यापक प्रभाव रहा है और कई स्थानों पर भगवान बुद्ध को भगवान विष्णु के अवतार के रूप में भी पूजा जाता रहा है।
डॉ. मिश्र ने बताया कि वर्ष 2016 में मधुबनी के अंधराठाड़ी क्षेत्र से देवी तारा की प्रतिमा और तीन महत्वपूर्ण अभिलेख मिले थे। इसके अलावा गिरिजा स्थान, मंगरौनी, लखनौर, मनपौर, विदेश्वरस्थान, जमुथरि हाटी, जरहटिया, उच्चैठ, खोइर तथा दरभंगा के कोर्थू, देकुली, महिया और नवादा क्षेत्रों से भी अनेक बौद्धकालीन अवशेष प्राप्त हुए हैं। दरभंगा के चंद्रधारी संग्रहालय में 11वीं शताब्दी की महाश्री तारा की प्रतिमा सुरक्षित रखी गई है।
नेपाल के इतिहास शोधार्थी डीके सिंह के अनुसार कर्नाट वंश की राजधानी रहे नेपाल के सिमरौनगढ़ से भी भगवान बुद्ध की कई प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं। पाल-सेन कला शैली और कर्नाट काल से जुड़ी इन प्रतिमाओं का कालखंड लगभग 12वीं सदी का माना जाता है। यहां से प्राप्त पद्मासन मुद्रा में भगवान बुद्ध की एक दुर्लभ प्रतिमा वर्तमान में काठमांडू के राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित है।

इतिहासकारों का मानना है कि कर्नाट वंश का शासनकाल मूर्तिकला का स्वर्णिम युग था। इस दौरान विभिन्न देवी-देवताओं के साथ भगवान बुद्ध और देवी तारा की प्रतिमाओं का भी बड़े पैमाने पर निर्माण कराया गया। दरभंगा के कोर्थू से प्राप्त भगवान बुद्ध के सिर का अवशेष दुर्लभ श्रेणी का माना जाता है, जिसे महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय में संरक्षित रखा गया है।
मिथिला के प्राचीन साहित्य में भी भगवान बुद्ध का उल्लेख मिलता है। 13वीं शताब्दी में मैथिल विद्वान ज्योतिरिश्वर ठाकुर द्वारा रचित प्रसिद्ध गद्य ग्रंथ वर्ण रत्नाकर में भगवान बुद्ध और उनके अनुयायियों का जिक्र किया गया है। इतिहासकारों के अनुसार इस ग्रंथ में मिथिला के अनेक गांवों का उल्लेख है, जहां बौद्ध धर्मावलंबियों की संख्या अधिक थी और भगवान बुद्ध की पूजा-अर्चना की जाती थी।
पूर्व निदेशक, संग्रहालय (बिहार) डॉ. उमेशचंद्र द्विवेदी ने कहा कि खुदाई के दौरान उस कालखंड की खंडित मूर्तियां लगातार मिल रही हैं। यह मिथिला के समृद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक इतिहास का महत्वपूर्ण प्रमाण है। उन्होंने ऐसे सभी अवशेषों को वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित कर संग्रहालयों में सुरक्षित रखने की आवश्यकता पर बल दिया।
फुलहर से मिली नई प्रतिमा और अभिलेख के अवशेषों ने एक बार फिर यह संकेत दिया है कि मिथिला केवल राम-जानकी की भूमि ही नहीं, बल्कि बौद्ध संस्कृति और विरासत का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र रही है।












