‘पागल’ कहे गए किसान बने प्राकृतिक खेती के मास्टर ट्रेनर, अब जिलेभर के किसानों को दे रहे प्रशिक्षण
मुजफ्फरपुर। दीपक। कभी प्राकृतिक खेती अपनाने के फैसले पर परिवार और गांव के लोगों की आलोचना झेलने वाले मड़वन प्रखंड के बगाही गांव निवासी किसान लगनदेव राय आज जिले में प्राकृतिक खेती के मास्टर ट्रेनर के रूप में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। संघर्ष, धैर्य और लगातार प्रयोगों के दम पर उन्होंने न सिर्फ अपनी खेती को सफल बनाया, बल्कि अब अन्य किसानों को भी टिकाऊ और कम लागत वाली खेती की राह दिखा रहे हैं।
लगनदेव राय बताते हैं कि करीब 15 वर्ष पहले उन्होंने रासायनिक खेती छोड़ प्राकृतिक खेती अपनाने का निर्णय लिया था। उस समय परिवार और आसपास के लोगों ने उनके इस कदम का विरोध किया। लोगों का मानना था कि बिना रासायनिक खाद और कीटनाशकों के खेती करना संभव नहीं है। काफी समझाने-बुझाने के बाद उन्हें प्रयोग के लिए एक एकड़ जमीन मिली, जहां उन्होंने प्राकृतिक खेती की शुरुआत की।
उन्होंने बताया कि शुरुआती दो-तीन वर्षों तक अपेक्षित परिणाम नहीं मिले और कई बार निराशा भी हाथ लगी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। लगातार सीखने और प्रयोग करने के बाद तीसरे वर्ष से प्राकृतिक और रासायनिक खेती के परिणामों में संतुलन दिखने लगा। सबसे बड़ा लाभ खेती की लागत में भारी कमी के रूप में सामने आया।
मास्टर ट्रेनर बन किसानों को दे रहे मार्गदर्शन:
आज लगनदेव राय प्राकृतिक खेती के क्षेत्र में जिले के अग्रणी किसानों में शामिल हैं। उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए कृषि विज्ञान केंद्र, सरैया द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। उनकी उपलब्धियों को देखते हुए जिला कृषि विभाग ने उन्हें नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग (NMNF) के तहत किसानों के प्रशिक्षण कार्यक्रम में मास्टर ट्रेनर की जिम्मेदारी सौंपी है। जिला स्तरीय फल एवं सब्जी उत्पादन प्रदर्शनी में भी उनके उत्पादों को सम्मान मिल चुका है।

लगनदेव राय के अनुसार, एक एकड़ धान की प्राकृतिक खेती में मात्र 400 से 500 रुपये तक खर्च आता है, जबकि रासायनिक खेती में यही लागत तीन से पांच हजार रुपये तक पहुंच जाती है। प्राकृतिक खेती में प्रति कट्ठा 50 से 60 किलोग्राम धान का उत्पादन होता है, जबकि रासायनिक खेती में 70 से 90 किलोग्राम तक उपज मिलती है। हालांकि उत्पादन में कुछ अंतर है, लेकिन लागत में भारी कमी और मिट्टी की उर्वरता में सुधार इसे किसानों के लिए लाभकारी बनाता है।
उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती में खरपतवार अपेक्षाकृत कम उगते हैं तथा आवश्यक जैविक घोल, खाद और पोषक तत्व किसान स्वयं तैयार कर लेते हैं। इससे बाजार पर निर्भरता घटती है और खेती अधिक टिकाऊ बनती है। साथ ही पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलता है।
अनुभवी किसानों की भूमिका अहम:
नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग योजना के नोडल पदाधिकारी एवं सहायक निदेशक (रसायन) कुणाल सिंह ने कहा कि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने में लगनदेव राय जैसे अनुभवी किसानों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। वे अपने अनुभवों के माध्यम से किसानों को कम लागत, पर्यावरण-अनुकूल और टिकाऊ खेती की ओर प्रेरित कर रहे हैं। इसी कारण उन्हें जिले के मास्टर ट्रेनरों के पैनल में शामिल किया गया है।
आज लगनदेव राय की सफलता उन किसानों के लिए प्रेरणा बन गई है जो खेती में बढ़ती लागत और घटते मुनाफे से परेशान हैं। उनकी कहानी यह साबित करती है कि दृढ़ संकल्प और निरंतर प्रयास से खेती में भी नई राह बनाई जा सकती है।












