-पद्मश्री डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी का निधन: बिहार की कृषि क्रांति का एक युग हुआ समाप्त
पटना/मुजफ्फरपुर/बंदरा। दीपक कुमार तिवारी।
बिहार ही नहीं, देश के कृषि एवं शिक्षा जगत के लिए मंगलवार की सुबह एक अत्यंत दुखद खबर लेकर आई। पद्मश्री से सम्मानित प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक, पूसा कृषि विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और किसानों के मार्गदर्शक डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी का 96 वर्ष की आयु में निधन हो गया। पटना के मेदांता अस्पताल में इलाज के दौरान सुबह करीब 5:30 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके पुत्र डॉ. रमन कुमार त्रिवेदी ने बताया कि सांस संबंधी परेशानी के बाद रविवार को उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां तीन दिनों तक चले इलाज के बाद उनका निधन हो गया।
डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी का जाना केवल एक व्यक्ति का निधन नहीं, बल्कि बिहार की कृषि चेतना के एक ऐसे अध्याय का अंत है जिसने गांव, किसान और खेती की तस्वीर बदलने का काम किया। अपने जीवन के अंतिम समय तक वे खेत, किसान और गांव की मिट्टी से जुड़े रहे। पद, प्रतिष्ठा और राष्ट्रीय सम्मान मिलने के बाद भी उन्होंने अपनी जड़ों को कभी नहीं छोड़ा।
लीची के बागों को नई जिंदगी देने वाले वैज्ञानिक:
मुजफ्फरपुर विश्वभर में लीची उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन समय के साथ जिले के हजारों पुराने लीची बाग उत्पादन खोने लगे थे। ऐसे समय में डॉ. त्रिवेदी ने वर्ष 2003 में “पुनर्जीवन कैनोपी मैनेजमेंट तकनीक” की शुरुआत कर कृषि क्षेत्र में नई क्रांति ला दी।
यह तकनीक विशेष रूप से 40 से 50 वर्ष पुराने और कम उत्पादन देने वाले लीची के पेड़ों के लिए विकसित की गई थी। इसके तहत ऊंचे और घने पेड़ों की वैज्ञानिक तरीके से कटाई-छंटाई कर उन्हें लगभग डेढ़ मीटर तक छोटा किया जाता था। इसके बाद पेड़ों में नई और स्वस्थ शाखाएं तेजी से निकलती थीं, जिससे उत्पादन कई गुना बढ़ जाता था।
उन्होंने सबसे पहले अपने ही बाग के 10 पेड़ों पर यह प्रयोग किया, जहां फलन में सवा क्विंटल तक वृद्धि दर्ज की गई। इस तकनीक ने हजारों किसानों को पुराने बागों को काटे बिना ही नए जैसा उत्पादन देने का रास्ता दिखाया। आज मुजफ्फरपुर में लगभग 12 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में लीची की खेती होती है और इसमें डॉ. त्रिवेदी के योगदान को किसान कभी नहीं भूल सकते।
‘बाबा परियोजना’ से बदली जलजमाव वाले इलाकों की तस्वीर:
डॉ. त्रिवेदी ने केवल लीची ही नहीं, बल्कि जलजमाव वाले क्षेत्रों में खेती की नई संभावनाओं को भी जन्म दिया। उन्होंने “बिहार एक्वाकल्चर बेस्ड एग्रीकल्चर” यानी ‘बाबा परियोजना’ के माध्यम से मखाना, सिंघाड़ा, मछली पालन और बहुफसली खेती का ऐसा मॉडल विकसित किया जिसने किसानों की आय बढ़ाने के साथ रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए।
उनके प्रयास से 22 किसानों ने 86 एकड़ परती और जलजमाव वाली जमीन को मत्स्य आधारित खेती में बदल दिया। इसमें तालाबों में मछली पालन, किनारों पर पौधारोपण और अन्य फसलों की खेती शामिल थी। इस मॉडल से भूजल स्तर में सुधार हुआ और लगभग 30 से 35 लोगों को प्रत्यक्ष तथा करीब 200 लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार मिला।
बिहार में शीतकालीन मक्का क्रांति के जनक:
बिहार में “शीतकालीन मक्का” की खेती को लोकप्रिय बनाने का श्रेय भी डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी को ही जाता है। उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण और किसानों के बीच सतत जागरूकता अभियान के कारण बिहार आज देश के अग्रणी मक्का उत्पादक राज्यों में गिना जाता है। उन्होंने केवल खेती की तकनीक नहीं बदली, बल्कि किसानों की सोच बदल दी।
संघर्ष से कुलपति बनने तक की प्रेरक कहानी:
15 फरवरी 1930 को मुजफ्फरपुर जिले के बंदरा प्रखंड अंतर्गत मतलूपुर गांव में एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे डॉ. त्रिवेदी का जीवन संघर्षों से भरा रहा। पिता के निधन के बाद उन्हें पढ़ाई छोड़ खेती करनी पड़ी। लेकिन मां की प्रेरणा और स्वतंत्रता सेनानी यमुना कार्जी के मार्गदर्शन ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी।
कहा जाता है कि यमुना कार्जी के कहने पर उन्होंने पोस्टकार्ड पर आवेदन लिखकर कृषि विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल पर उन्होंने स्नातक, स्नातकोत्तर और फिर पीएचडी पूरी की। आगे चलकर वे उसी विश्वविद्यालय के कुलपति बने, जहां कभी छात्र थे। वर्ष 1988 से 1991 तक उन्होंने पूसा कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में कार्य किया और संस्थान को नई पहचान दिलाई।
गांव और समाज से गहरा जुड़ाव:
सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने शहरों की सुविधा नहीं चुनी, बल्कि अपने गांव मतलुपुर लौट आए। यहां रहकर किसानों को आधुनिक खेती, मछली पालन, बकरी पालन, मुर्गी पालन और जैविक खेती का प्रशिक्षण देते रहे। वे चाहते थे कि गांव आत्मनिर्भर बनें और किसान सम्मान के साथ जीवन जी सकें।वे सदैव युवाओं को प्रेरित एवं उत्साहित करते रहे।

वे गहरे आध्यात्मिक व्यक्तित्व भी थे। गांव के अतिप्राचीन बाबा खगेश्वर नाथ मंदिर,मतलुपुर से उनका विशेष लगाव था।यहां मंदिर न्याय समिति के अध्यक्ष के रूप में काफी सक्रिय रहे। प्रत्येक माह रुद्राभिषेक कराना और अपने बाग के बेलपत्र भगवान शिव को अर्पित करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था।
पद्मश्री सम्मान से बढ़ाया बिहार का गौरव:
भारत सरकार ने वर्ष 2026 में विज्ञान एवं इंजीनियरिंग (कृषि) श्रेणी में उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री सम्मान से अलंकृत किया था। यह सम्मान केवल उनके लिए नहीं, बल्कि बिहार की कृषि परंपरा और किसानों के संघर्ष का सम्मान माना गया।
शोक की लहर, जनप्रतिनिधियों और समाज के लोगों ने दी श्रद्धांजलि:
डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी के निधन की खबर मिलते ही कृषि, शिक्षा और सामाजिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई। केंद्रीय मंत्री सह मुजफ्फरपुर सांसद राजभूषण चौधरी निषाद, गायघाट की जेडीयू विधायक कोमल सिंह,पूर्व विधायक महेश्वर प्रसाद यादव, पूर्व विधायक निरंजन राय, प्रख्यात कथावाचक छोटे बापू, मंदिर न्यास समिति के सचिव वैद्यनाथ पाठक, जदयू प्रखंड अध्यक्ष मनोज कुशवाहा, भाजपा मंडल अध्यक्ष अशोक सिंह, देवेंद्र पांडेय,जिला पार्षद फणीश कुमार चुन्नू,रामानंद ओझा उर्फ मुकेश ओझा, सीनियर सिटीजन काउंसिल के रघुनंदन प्रसाद सिंह, वीरचंद्र ब्रह्मचारी, सामाजिक कार्यकर्ता श्याम किशोर सहित बड़ी संख्या में लोगों ने गहरी संवेदना व्यक्त की।
लोगों का कहना है कि डॉ. त्रिवेदी जैसे व्यक्तित्व विरले ही जन्म लेते हैं। उन्होंने खेतों को विज्ञान से जोड़ा, किसानों को आत्मविश्वास दिया और गांवों को विकास का रास्ता दिखाया। इस उम्र में भी उनका रूटीन लाइफ स्टाइल था। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना रहेगा।
वो बातें जो अधूरी रह गईं…
पद्मश्री डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी केवल कृषि वैज्ञानिक या पूर्व कुलपति भर नहीं थे, बल्कि समाज, संस्कृति और गांव की आत्मा से गहराई से जुड़े हुए व्यक्तित्व थे। उनके जाने के साथ कई सपने, कई योजनाएं और कई अधूरी बातें भी स्मृतियों में रह गईं।
डॉ. त्रिवेदी मंदिर न्यास समिति के अध्यक्ष और भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। बाबा खगेश्वरनाथ मंदिर के विकास और जीर्णोद्धार को लेकर वे हमेशा सक्रिय रहते थे। उनकी पहल पर मतलूपुर में विश्वप्रसिद्ध बाबा पशुपतिनाथ मंदिर की तर्ज पर बाबा खगेश्वरनाथ मंदिर के भव्य स्वरूप निर्माण की शुरुआत हुई थी। वे चाहते थे कि यह मंदिर न केवल आस्था का केंद्र बने, बल्कि क्षेत्र की पहचान भी बने।सरकार के पहल से पर्यटक स्थल बने। हालांकि तकनीकी कारणों से मंदिर निर्माण कार्य अधूरा रह गया, जिसका मलाल उन्हें हमेशा रहा।
वे युवाओं को केवल नौकरी के पीछे भागने के बजाय कृषि और ग्रामीण उद्यमिता अपनाने की सलाह देते थे। उनका मानना था कि यदि सरकार किसानों को आर्थिक सहायता, आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक, कृषि यंत्र और बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराए, तो भारत कृषि उत्पादन में दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बन सकता है।
अक्सर कहा करते थे—
“बिहार की मिट्टी इतनी उर्वर और शक्तिशाली है कि यहां का किसान दुनिया को भोजन दे सकता है। जरूरत केवल सही तकनीक और सही नीति की है।”
व्यावसायिक मक्का उत्पादन को लेकर उनका विश्वास बेहद मजबूत था। वे कहते थे कि बिहार का मक्का उत्पादन एक दिन अमेरिका जैसी बड़ी कृषि अर्थव्यवस्थाओं को चुनौती दे सकता है। उनका सपना था कि बिहार खेती के क्षेत्र में आत्मनिर्भर ही नहीं, बल्कि विश्व का मार्गदर्शक बने।
डॉ. त्रिवेदी का सामाजिक दृष्टिकोण भी बेहद प्रेरणादायी था। वे मानते थे कि सीनियर सिटीजन को युवाओं से दूर नहीं होना चाहिए, बल्कि उनके बीच रहकर मार्गदर्शक की भूमिका निभानी चाहिए। वे स्वयं ऐसा करते थे। क्षेत्र के युवाओं के साथ बैठना, खेती और जीवन के अनुभव साझा करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था।
वे कहा करते थे—
“युवाओं के बीच रहने से नई ऊर्जा मिलती है और अनुभव का सही उपयोग भी होता है।”
उनकी यही सोच उन्हें एक वैज्ञानिक से कहीं अधिक समाज का शिक्षक और प्रेरक व्यक्तित्व बनाती थी। आज वे भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी बातें, उनके सपने और गांव-किसान के लिए उनका समर्पण हमेशा प्रेरणा देता रहेगा।उम्र के अंतिम पड़ाव में भी वे काफी ऊर्जान्वित एवं पॉजिटिव सोंच रखते थे।












