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पंचायत चुनाव की तैयारी तेज, निर्वाचन क्षेत्रों का प्रारूप जारी; गांवों में सियासी हलचल तेज

-पंचायत चुनाव की तैयारी तेज, निर्वाचन क्षेत्रों का प्रारूप जारी; गांवों में सियासी हलचल तेज

पटना।बिहार की ग्रामीण राजनीति एक बार फिर गर्मा गई है। त्रिस्तरीय पंचायत एवं ग्राम कचहरी चुनाव को लेकर Bihar State Election Commission ने बड़ा कदम उठाते हुए निर्वाचन क्षेत्रों की आबादी का प्रारूप (प्रपत्र-1) जारी कर दिया है। इसके साथ ही गांव-गांव में राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है और संभावित उम्मीदवारों के बीच रणनीति बनाने का दौर शुरू हो गया है।

आयोग के अनुसार, इस बार पूरी प्रक्रिया को डिजिटल माध्यम से संचालित किया जा रहा है, जिससे पारदर्शिता और डेटा आधारित व्यवस्था को मजबूती मिले। सभी आंकड़े आयोग की वेबसाइट पर अपलोड कर दिए गए हैं, ताकि आम लोग भी आसानी से जानकारी प्राप्त कर सकें।

निर्धारित कार्यक्रम के तहत 18 मई तक दावा-आपत्ति दर्ज कराने का मौका दिया गया है, जबकि 22 मई तक आपत्तियों का निष्पादन किया जाएगा। इसके बाद 5 जून को अंतिम सूची जारी की जाएगी, जो चुनावी समीकरणों को निर्णायक रूप से प्रभावित करेगी।

इस बार सबसे बड़ा बदलाव उन क्षेत्रों में देखने को मिल रहा है, जहां ग्रामीण इलाकों को नगर निकाय में शामिल किया गया है। इससे कई पंचायतों की संरचना बदल गई है और आरक्षण रोस्टर को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। गांवों में संभावित आरक्षण बदलाव को लेकर सियासी माहौल गरमा गया है।

2011 की जनगणना को आधार बनाकर तैयार इस प्रारूप में अनुसूचित जाति और जनजाति की आबादी को अलग-अलग दर्शाया गया है, जबकि अन्य वर्गों को एक साथ रखा गया है। इसी आधार पर पंचायतों में आरक्षण और सत्ता का गणित तय होगा।

जिले के 19 प्रखंडों की 283 पंचायतों और 3889 वार्डों के लिए यह प्रारूप जारी किया गया है। संभावित उम्मीदवार अब अपने क्षेत्रों की जातीय और जनसंख्या संरचना का विश्लेषण कर रहे हैं, ताकि यह समझा जा सके कि कौन-सी सीट किस वर्ग के लिए आरक्षित हो सकती है।

जिला पंचायत राज पदाधिकारी के अनुसार, ग्राम पंचायत और पंचायत समिति सदस्य पद के लिए आपत्तियां संबंधित ग्राम पंचायत और प्रखंड कार्यालय में दर्ज कराई जा सकती हैं। वहीं जिला परिषद सदस्य पद के लिए प्रखंड, अनुमंडल और जिलाधिकारी कार्यालय में आवेदन की व्यवस्था की गई है। प्रशासनिक स्तर पर बीडीओ, एसडीओ और जिलाधिकारी को क्रमशः निर्णय और अपीलीय प्राधिकारी बनाया गया है, जिनका निर्णय अंतिम होगा।

इस पूरी प्रक्रिया ने गांवों में राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। कई पुराने दावेदार अब बदलते समीकरणों के अनुसार नई रणनीति और गठजोड़ बनाने में जुट गए हैं। स्पष्ट है कि इस बार पंचायत चुनाव केवल मतदान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आंकड़ों, आरक्षण और डिजिटल पारदर्शिता के बीच एक नई सियासी जंग के रूप में उभर रहा है।