-बदलते नारों से बदलती राजनीति: बंगाल में सत्ता परिवर्तन का व्यापक परिप्रेक्ष्य
आलेख: दीपक कुमार तिवारी।
“जहां हुए बलिदान मुखर्जी, वो कश्मीर हमारा है”—यह नारा दशकों तक भारतीय राजनीति में गूंजता रहा। लेकिन आज परिदृश्य बदला हुआ है। अब एक नया नारा उभरता दिख रहा है—“जहां पैदा हुए श्यामा प्रसाद मुखर्जी, वो बंगाल हमारा है।” यह बदलाव केवल शब्दों का नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के एक बड़े संक्रमण का संकेत है।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जन्मभूमि पश्चिम बंगाल आज एक नए राजनीतिक अध्याय के मुहाने पर खड़ी दिखाई देती है। आजादी के बाद पहली बार भारतीय जनता पार्टी यहां सत्ता के करीब या सत्ता में पहुंचती दिख रही है—यह केवल एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि दशकों से स्थापित राजनीतिक धारणाओं के टूटने का संकेत है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति लंबे समय तक वामपंथी विचारधारा के इर्द-गिर्द घूमती रही। करीब 34 वर्षों तक वाम मोर्चा ने राज्य की सत्ता संभाली। लेकिन 2011 में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने इस लंबे शासन को समाप्त कर दिया।
तृणमूल कांग्रेस का उदय तेज़ और प्रभावशाली था। 2001 में अस्तित्व में आई पार्टी ने मात्र एक दशक में सत्ता हासिल कर ली और फिर लगातार दो कार्यकाल तक मजबूत पकड़ बनाए रखी। उस समय यह धारणा बन गई थी कि तृणमूल का विकल्प फिलहाल संभव नहीं।
लेकिन राजनीति में स्थायित्व एक भ्रम साबित होता है। भारतीय जनता पार्टी ने 2016 में महज 3 सीटों से शुरुआत की और 2026 तक सत्ता के केंद्र में पहुंचने की स्थिति बना ली। यह उभार केवल संगठनात्मक मजबूती का परिणाम नहीं, बल्कि जनभावनाओं में आए बदलाव का भी संकेत है।

उत्तर बंगाल—विशेषकर सिलीगुड़ी, न्यू जलपाईगुड़ी और दार्जिलिंग—में बीजेपी का प्रभाव पहले से रहा है, लेकिन अब यह प्रभाव व्यापक जनसमर्थन में बदलता दिख रहा है।
उत्तर बंगाल के लोगों में लंबे समय से उपेक्षा की भावना रही है। स्थानीय लोगों का आरोप रहा है कि “ट्रिपल टी”—टिंबर, टूरिज्म और टी (चाय)—से होने वाली आय का बड़ा हिस्सा कोलकाता तक सीमित रह गया, जबकि क्षेत्रीय विकास पीछे छूट गया।
इस असंतोष ने राजनीतिक दिशा बदलने में अहम भूमिका निभाई। लोगों की अपेक्षा है कि नई सरकार क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करेगी, बुनियादी सुविधाओं जैसे जलापूर्ति, सड़क और रोजगार के अवसरों को बेहतर बनाएगी।
बीजेपी ने चुनावी वादों में कर्मचारियों के लिए सातवें वेतन आयोग को लागू करने, आधारभूत ढांचे को मजबूत करने और विकास योजनाओं को तेज़ी से लागू करने की बात कही है। अब असली परीक्षा इन वादों को धरातल पर उतारने की होगी।
साथ ही, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए यह क्षण वैचारिक संतोष का भी हो सकता है, जिसे वे वर्षों की ‘तपस्या’ का परिणाम मानते हैं।
निष्कर्षत: लोकतंत्र का स्वाभाविक चक्र
पश्चिम बंगाल का यह राजनीतिक परिवर्तन भारतीय लोकतंत्र की उस जीवंतता को दर्शाता है, जहां कोई भी सत्ता स्थायी नहीं होती। जनता का मूड, क्षेत्रीय मुद्दे, नेतृत्व की विश्वसनीयता—ये सभी मिलकर सत्ता की दिशा तय करते हैं।
तृणमूल कांग्रेस का भविष्य क्या होगा, यह समय बताएगा, लेकिन इतना स्पष्ट है कि बंगाल की राजनीति अब एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है—जहां प्रतिस्पर्धा, अपेक्षाएं और जवाबदेही पहले से कहीं अधिक बढ़ गई हैं।












