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अगर मौका मिला कभी…

-अगर मौका मिला कभी…

 

अगर मौका मिला कभी,

तो कागज़ पर अपनी थकान लिखूँगा,

मज़बूत कंधों के पीछे छुपा

वो छोटा सा इंसान लिखूँगा।

वो जो हर दर्द को हँसी में छुपाकर कह देता है,

“सब ठीक है…”

उस एक झूठ के पीछे दबे

हज़ारों बेकाबू तूफ़ान लिखूँगा।

नहीं लिखूँगा सिर्फ अपनी जीत के किस्से,

ना ही दुनिया की वाहवाही का नाम लिखूँगा,

मैं तो हारकर भी जो मुस्कुराया—

उस लहूलुहान स्वाभिमान का पैग़ाम लिखूँगा।

लिखूँगा वो रातें,

जहाँ तकिया मेरी ख़ामोशी का गवाह था,

और सुबह उठकर फिर से ओढ़ ली मैंने

वो चट्टान जैसी मुस्कान—

उस झूठी पहचान का इल्ज़ाम लिखूँगा।

अगर लिख पाया कुछ सच्चा,

तो खुद को ही लिख डालूँगा,

रूह के हर ज़ख्म को शब्द बनाकर,

अपना ही सम्मान लिखूँगा।

प्रस्तुति: दीपक कुमार तिवारी