–संत समाज भेद को मिटाकर अभेद प्रस्तुत करते है ; प्रो. संजय श्रीवास्तव
– दो दिवसीय ‘संत साहित्य की सांस्कृतिक चेतना’ कार्यक्रम रुद्रा सभागार में हुई आयोजित
मोतिहारी, राजन द्विवेदी।
महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय मोतिहारी, बिहार के मानविकी व भाषा संकाय में हिंदी विभाग के तत्त्वावधान में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी विषय ‘संत साहित्य की सांस्कृतिक चेतना’ का आयोजन 18-19 मार्च 2026 को रुद्रा रेजेंसी के सभागार में किया गया।
कार्यक्रम में उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रोफेसर संजय श्रीवास्तव में अपने उद्बोधन में कहां की कबीर के महत्वपूर्ण पद “जल में कुंभ है कुंभ में जल है,
बाहर भीतर पानी, फूटा कुंभ जल ही जल समान। अर्थात समाज में जितने भी प्रकार के भेद हैं उन्हें यह संत अभेद के रूप में बदलकर समाज को नई दृष्टि प्रदान करते है।
संत परंपरा के जितने भी लोग हैं सब मूलत: एवं अशंत: भक्त थे, उनकी भक्ति का ही परिणाम सामाजिक दार्शनिक एवं मनोवैज्ञानिक चेतना है।
सारस्वत अतिथि के रूप में नालंदा नव विहार विश्वविद्यालय से पधारे प्रो. रविंद्र नाथ श्रीवास्तव ने अपने सारगर्भित उद्बोधन में कहा कि संत साहित्य का केंद्र है ‘मैं कौन हूं’। इनका साहित्य शरीर और आत्मा का पुर्नपाठ है। संत कवि भीड़ के कवि नहीं है, वे अकेले खड़े होने का सामर्थ रखते हैं। संतों की वाणी में जो मौन है वह और भी महत्वपूर्ण है।
वहीं मुख्य वक्ता के रूप में मुंबई विश्वविद्यालय के सेवानिवृत आचार्य डॉ. रामजी तिवारी ने अपने वक्तव्य में कहा कि संत साहित्य एक जाति का उभरा हुआ सचेतन प्रयास है। संतों ने समाज की जड़ता एवं भेदभाव को तोड़ा, इन्होंने लोक भाषा को महत्व दिया।

जबकि मुख्य अतिथि के रूप में हिंदू कॉलेज सोनीपत से आए डॉ. पूर्णमल गौड़ ने कहा कि संतों का साहित्य शिक्षाप्रद एवं प्रेरित करने वाला साहित्य है, इन्होंने व्यावहारिक पक्ष पर जोर दिया है, सर्वे भवंतु सुखिन: का भाव सारे संत साहित्य में विद्यमान है।
कार्यक्रम में विषय प्रवर्तन करते हुए डॉ. रामेश्वर मिश्र ने कहा कि संत साहित्य शास्त्रवाद का खंडन कर लोक पक्ष को आधार बनाता है। संत और भक्तों में क्या अंतर है, जैसे प्रश्नों को उठाया गया है।
समारोह में पधारे सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए मानविकी एवं भाषा संकाय के अधिष्ठाता एवं हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. राजेंद्र बडगूजर ने कहा कि स्वानुभूत, गृहस्थ भक्ति एवं समता का भाव संत साहित्य की विशेषता है।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं मंगल चरण से प्रारंभ किया गया। सभी अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ, अंग वस्त्र, प्रतीक चिन्ह एवं प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया।
संगोष्ठी के अंतर्गत प्रथम दिवस पर दो तकनीकी सत्र आयोजित किए गये। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा से पधारे पूर्व कुलपति डॉ. कृष्ण कुमार सिंह ने कहा कि संत साहित्य जागरण का काव्य है। संत कवियों ने कभी किसी राजा महाराजा के सामने हाथ नहीं फैलाया। संतों के यहां प्रशस्तिपरक रचना नहीं हुई है। वक्ता के तौर अंग्रेजी विभागाध्यक्ष प्रो. विमलेश कुमार सिंह ने कहा कि सांस्कृतिक चेतना भारत की आत्मा है। संतों के जीवन की अनुभूति एवं अनुभव में प्रश्न का समाधान भी किया गया है।
राणा प्रताप स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सुल्तानपुर से पधारे
डॉ. इंद्रमणि कुमार ने अपने वक्तव्य में कहा कि संत कवि अपने समय की जड़ता का विरोध करते हैं। यह उपासना का एक नया वैकल्पिक मार्ग की मांग करते हैं।
जयप्रकाश विश्वविद्यालय छपरा से पधारे प्रो. सिद्धार्थ शंकर छपरा की सांस्कृतिक चेतना को विस्तार से बताया वहीं गोरखपुर में दिग्विजय नाथ स्नातकोत्तर महाविद्यालय से पधारे डॉ. नित्यानंद श्रीवास्तव ने कहा कि समाज का जो सर्वोच्च वर्ग है उसकी चेतना को काम, क्रोध, लोभ आदि ने ग्रस लिया है। इससे भारत का संस्कृतिक सूर्य अस्त हो रहा है, क्योंकि अंतःकरण की चेतना लुप्त हो रही है।
उक्त तकनीकी सत्र में तीन शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र का वाचन किया।











