-तमसो मा ज्योतिर्गमय अर्थात् अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का भाव है झिंझिया
मोतिहारी, राजन द्विवेदी।
भारतीय सांस्कृतिक उत्सव एवं परम्पराओं का वही महत्व है जो भारतीय संस्कृति का आधारभूत वेद,पुराण,धर्मशास्त्र,रामायण,महाभारत आदि का है। सम्पूर्ण हिन्दू परंपरायें इन्हीं ग्रन्थों के आधार पर बनी है। इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि ग्रामवचनं कुर्यात् अर्थात् गाँव की परंपराओं का अनुपालन करें। इसका कारण यह है कि सभी धार्मिक ग्रंथ दो तरह की शिक्षायें देतीं हैं- एक विचारात्मक और दूसरी व्यवहारात्मक। गाँव की माता-बहनें जो झिंझिया के रूप में परम्पराओं का पालन करतीं हैं,उसका संबंध शास्त्र से प्रत्यक्ष दिखाई नहीं पड़ता परन्तु यह परंपरायें किसी न किसी रूप में किसी न किसी शास्त्र के साथ संबद्ध अवश्य है।
उक्त जानकारी महर्षिनगर स्थित आर्षविद्या शिक्षण प्रशिक्षण सेवा संस्थान-वेद विद्यालय के प्राचार्य सुशील कुमार पाण्डेय ने दी।
उन्होंने बताया कि जहाँ तक झिंझिया का संबंध है इस परंपरा की भी स्थिति लगभग ऐसी ही है। कालिक भेद के कारण उत्सवों का स्वरूप बदल जाया करता है। वैदिक मंत्रों में दीप एवं प्रकाश को अंधकार,माया एवं राक्षसी वृत्तियों को खत्म करने का साधन माना गया हैl

जिसके प्रभाव से पौराणिक काल में नवदुर्गा के प्रसंग में नवरात्र के समय पूजा की परंपरा से संबंधित अनेक प्रकार की देश,काल,परिस्थिति के अनुसार परंपरा देखने में आती है। दुर्गा सप्तशती के अध्ययन के आधार पर प्राचीन काल में गाँव की महिलायें नव की संख्या में नवदुर्गा के रूप में वस्त्राभूषण पहनकर हाथ में दुर्गा के खप्पर अथवा ज्योति पात्र को लेकर गाँव की सीमा का चक्कर लगातीं थीं। वही झिलमिल-झिलमिल शब्द कालांतर में झिंझिया के रूप में प्रचलित हो गया। झिंझिया की परंपरा तमसो मा ज्योतिर्गमय अर्थात् अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की प्रेरणा देती है।
प्राचार्य पाण्डेय ने बताया कि चूंकि वैदिक संस्कृत और वैदिक साहित्य का प्रभाव सम्पूर्ण भारतवर्ष के क्षेत्रों के साथ बिहार पर भी पड़ा। अतः झिंझिया की परंपरा आज भी बिहार एवं कुछ अन्य क्षेत्रों में देखने को मिलती है। इसका तात्पर्य यह है कि छिद्र युक्त घड़े में रखे हुए दीपक के ज्योति पुंज के माध्यम से महिलायें दुर्गा का रूप धारण कर राक्षसियों को मानो खोज-खोज कर गाँव की सीमा से बाहर कर देतीं हैं। इधर पुरुष वर्ग नवरात्र में शक्ति की उपासना से परिवार, समाज ,गांव एवं राष्ट्र के लिए अहित करने वाली दुष्ट शक्तियों को नष्ट करता है। यही है तमसो मा ज्योतिर्गमय का भाव,जो झिंझिया के रूप में आज भी समाज में प्रचलित है।











