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मोटिवेशनल लेख : आत्म स्वरूप की खोज

🌿 मोटिवेशनल लेख : आत्म स्वरूप की खोज 🌿

आलेख: दीपक कुमार तिवारी।

जीवन में अक्सर हम शब्दों के मायाजाल में उलझ जाते हैं। कोई हमें कहता है – यह मंत्र जपो, कोई कहता है – वह नाम लो। हर कोई अपने-अपने ढंग से “शब्द” की व्याख्या करता है। परंतु असली प्रश्न यह है कि जिस “शब्द” की बात संत कर रहे हैं, क्या वह केवल भाषा का शब्द है?

कबीर साहिब स्पष्ट कहते हैं कि सच्चा शब्द न जीभ से बोला जाता है, न सांसों से जपा जाता है। वह शब्द तो हमारे आत्म स्वरूप का परिचय है। यह शब्द कोई अक्षर या ध्वनि नहीं, बल्कि हमारे भीतर छिपी हुई वह दिव्य शक्ति है, जो हमें परमात्मा से जोड़ती है।

भक्ति का सच्चा अर्थ केवल होंठों की हरकत या सांसों की गिनती नहीं है। असली भक्ति तब शुरू होती है, जब हमारी सुरत – अर्थात चेतना – भीतर की ओर मुड़ती है। बाहर की दुनिया हमें अस्थायी सुख देती है, पर आत्म स्वरूप की खोज हमें शाश्वत शांति और आनंद का अनुभव कराती है।

इस मार्ग पर चलने के लिए जरूरी है कि हम किसी भेदी गुरु से मिलें, जो हमें इस गुप्त भेद को निरखने और परखने की कला सिखा सके। गुरु का काम केवल हमें दिशा दिखाना है, साधना और आत्मानुभव हमें ही करना होता है।

🌸 याद रखें:

जीभ से बोले शब्द सीमित हैं, आत्मा का शब्द असीम है।

सांस से किया जप क्षणिक है, सुरत से किया जप अमर है।

बाहर की साधना साधन है, भीतर की साधना साध्य है।

जिस दिन हम अपने भीतर के शब्द को पहचान लेंगे, उसी दिन जीवन का असली रहस्य हमारे सामने खुल जाएगा। यही वह शक्ति है, जो हर कठिनाई में हमें संभालती है, हर अंधकार में हमें प्रकाश देती है और हर असफलता में हमें सफलता की ओर ले जाती है।

✨ “सच्चा शब्द बाहर नहीं, भीतर खोजो। वही शब्द तुम्हें परम शांति और आनंद तक ले जाएगा।” ✨