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‘दिशोम गुरु’ शिबू सोरेन नहीं रहे, झारखंड की राजनीति का एक युग हुआ समाप्त

-‘दिशोम गुरु’ शिबू सोरेन नहीं रहे, झारखंड की राजनीति का एक युग हुआ समाप्त

रांची। झारखंड आंदोलन के प्रणेता, वंचितों की आवाज और तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके झामुमो के संस्थापक शिबू सोरेन का सोमवार को दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में निधन हो गया। वे 81 वर्ष के थे। बीते 24 जून से वे गंगाराम अस्पताल में भर्ती थे, जहां आज शाम 5:56 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन से पूरे झारखंड में शोक की लहर दौड़ गई है।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सोशल मीडिया के माध्यम से यह दुखद सूचना साझा की। पिता की सेवा में लगातार लगे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, बसंत सोरेन व अन्य परिजन उनके अंतिम समय तक अस्पताल में मौजूद रहे।
उनके स्वस्थ होने की कामना में राज्य भर में मंदिरों, मस्जिदों व गिरजाघरों में प्रार्थनाएं की गईं, लेकिन झारखंड के ‘गांधी’ कहे जाने वाले शिबू सोरेन जिंदगी की जंग हार गए।

सियासत का ‘जननायक’:

शिबू सोरेन का झारखंड की राजनीति में योगदान अतुलनीय रहा है। संताल परगना उनकी कर्मभूमि रही। 70 के दशक में उन्होंने गरीबों, आदिवासियों और किसानों के हक के लिए आंदोलन की शुरुआत की। महाजनी प्रथा, शराबबंदी और शोषण के खिलाफ उनकी लड़ाई ने उन्हें ‘दिशोम गुरु’ बना दिया।

11 जनवरी 1944 को रामगढ़ के नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन के पिता एक शिक्षक थे, जिनकी हत्या के बाद शिबू ने स्कूल छोड़ संघर्ष की राह पकड़ ली। यही संघर्ष बाद में एक जनआंदोलन बन गया और उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की।

राजनीतिक सफर:

3 बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने

3 बार केंद्रीय कोयला मंत्री रहे

8 बार लोकसभा सांसद (दुमका से)

2 बार राज्यसभा सांसद

2 बार विधानसभा विधायक (जामा व जामताड़ा से)

2004 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार में उन्हें पहली बार कोयला मंत्री बनाया गया। लेकिन जामताड़ा के एक पुराने केस में गिरफ्तारी वारंट निकलने पर उन्होंने दो महीने में ही इस्तीफा दे दिया।

अंतिम विदाई की तैयारी:

उनके निधन की खबर के बाद दुमका, संताल परगना सहित पूरे झारखंड में शोक की लहर है। राजनीतिक, सामाजिक और आमजन उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं। राज्य सरकार द्वारा अंतिम संस्कार की तैयारी की जा रही है। उनके अंतिम दर्शन के लिए बड़ी संख्या में लोग उमड़ने की संभावना है।