Advertisement

सियासत: बिहार में बदलते सियासी मौसम का रुख भांप गए मुकेश सहनी!

-बिहार में बदलते सियासी मौसम का रुख भांप गए मुकेश सहनी!

-लालू और तेजस्वी को दिया टेंशन

दीपक कुमार तिवारी।पटना।

विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) प्रमुख मुकेश सहनी का मन डोल रहा है। ऐसा उनके साथ अक्सर होता है। पांच-सात साल के सियासी करियर में वे कई बार खेमा बदल चुके हैं। वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव से पहले उनके लिए आरजेडी के नेतृत्व वाला महागठबंधन सियासी महामोक्ष का केंद्र था। मोक्ष मिलना मुश्किल हुआ तो भागे-भागे एनडीए की ओर आए। भाजपा का मन पसीजा तो अपने कोटे से चार सीटें उन्हें दे दीं। भाग्य ने साथ दिया और सहनी के सभी उम्मीदवार जीत गए। नीतीश कुमार भी रहम दिल हुए और मुकेश को विधान परिषद के रास्ते सदन में बुला कर मंत्री बना दिया। मुकेश ने इसे अपनी काबिलियत समझी और भाजपा पर ही आंख तरेरने लगे। यूपी विधानसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा के खिलाफ ही मोर्चा खोलने की कवायद शुरू कर दी। भाजपा ने उनकी हेकड़ी तोड़ दी। उनके विधायकों को अपने पाले में कर लिया। नीतीश ने भी रहमी नहीं दिखाई। मुकेश सहनी को विधान परिषद लौटने की राह रोक दी। मंत्री पद का रुतबा स्वत: समाप्त हो गया। तब से सहनी मुकम्मल ठौर की तलाश में भटक रहे हैं।
भाजपा द्वारा अपने विधायकों को तोड़े जाने और मंत्री पद गंवाने के बाद से मुकेश सहनी अकेले ताल ठोंकते रहे। उन्हें इस बार लोकसभा चुनाव में अपने दिन फिरने की उम्मीद थी। चुनाव के पहले गृह मंत्री अमित शाह ने उन्हें केंद्रीय सुरक्षा मुहैया कराई तो कयास लगने लगे कि वे एनडीए में वापसी करेंगे। सीटों की बारगेनिंग के लिए उन्होंने निषाद आरक्षण के सवाल पर बिहार, यूपी और झारखंड में यात्रा निकाली। दो करोड़ की लागत से तैयार रथ पर वे घूमते रहे। भाजपा ने उन्हें भाव ही नहीं दिया। आखिरकार वे इंडिया ब्लाक की ओर मुखातिब हुए। पता नहीं, लालू प्रसाद यादव ने उन्हें किस ताकत का अनुमान लगाया कि अपने कोटे की तीन सीटें काट कर वीआईपी को दे दीं। तेजस्वी ने भी उन्हें चने की झाड़ पर यह कह कर चढ़ा दिया कि उनकी सरकार बनी तो मुकेश सहनी को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जाएगी। चुनाव प्रचार में वे तेजस्वी के साथ हेलीकॉप्टर की सवारी कर इतराते रहे। उनकी सियासी ताकत की पोल तब खुल गई, जब उनके तीनों उम्मीदवार हार गए। आरजेडी को भी उनकी ताकत का कोई लाभ नहीं मिला।


मुकेश सहनी के पिता की हत्या हुई तो सांत्वना के लिए न सिर्फ प्रदेश भाजपा के नेता मुकेश सहनी के घर गए, बल्कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी उन्हें फोन किया। उसके बाद से ही कयास लगने लगे कि मुकेश का मन बदलने लगा है। वे एनडीए के करीब आ रहे हैं। इस कयास को बल अब इसलिए मिला है कि उन्होंने पीएम नरेंद्र मोदी के आह्वान के बाद अपने सोशल मीडिया अकाउंट X पर अपने प्रोफाइल का पिक्चर बदल कर तिरंगा लगा दिया है। लोकसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद आरजेडी नेताओं के दरबार में उनकी हाजिरी भी बंद है।
मुकेश सहनी को लोकसभा चुनाव में भाजपा एक सीट देने को तैयार थी। वे अधिक सीटों की जिद ठाने हुए थे। लालू यादव ने तीन सीटें देकर उन्हें पटा लिया। पहली नजर में तो बाजी उनके हाथ लग गई, लेकिन एनडीए की ताकत से वे वंचित रह गए। हम (से) के संस्थापक जीतन राम मांझी ने एनडीए के प्रति अपनी निष्ठा बरकरार रखी। एक सीट पाकर भी वे संतुष्ट रहे। आज मांझी मोदी मंत्रिमंडल के सदस्य हैं। मांझी और मुकेश की तुलना इसलिए लाजिमी है कि दोनों 2020 में एक साथ एनडीए में आए थे। मांझी ने एनडीए का साथ नहीं छोड़ा, जबकि जिद और लालच में मुकेश ने मन बदल लिया।
मुकेश सहनी को अब इस बात का मलाल जरूर हो रहा होगा। संभव है कि उन्हें अपनी चूक का अब एहसास हो गया हो।