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अन्तरराष्ट्रीय नेल्सन मंडला दिवस पर बोधमाला व्याख्यान का आयोजन

-अन्तरराष्ट्रीय नेल्सन मंडला दिवस पर बोधमाला व्याख्यान का आयोजन
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• 27 साल बाद जेल से रिहा होने पर सबसे पहले की थी भारत की यात्रा

• महात्मा गाँधी को मानते थे अपना गुरु

• 1990 में नोबेल प्राइज़ से पहले भारत ने उन्हें किया था भारत रत्न से सम्मानित
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फ़्रीडम स्टडीज़ रिसर्च सेन्टर (स्वतंत्रता अध्ययन अनुसंधान केन्द्र) द्वारा आयोजित बोधमाला 2 का सफल आयोजन अन्तरराष्ट्रीय नेल्सन मंडला दिवस (18 जुलाई) के उपलक्ष्य में किया गया । वक्ता के रूप में लेखक डॉ. जावैद अब्दुल्लाह ने लगभग 653 पन्नों में लिखी मंडला की आत्मकथा–लॉन्ग वॉक टू फ़्रीडम (1994) पर बेहद विस्तार से प्रकाश डाला । डॉ. जावैद अब्दुल्लाह ने व्याख्यान के समापन में बताया कि मंडेला 27 साल बाद जेल से रिहा होने पर सबसे पहले भारत की यात्रा की थी, वे महात्मा गाँधी को अपना गुरु मानते थे । भारत यात्रा में वे बनारस भी आये और गंगा-घाट गये । बनारस में उनके सम्मान में 17 अक्तूबर 1990 को बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय ने एक विशेष कांवोकेशन आयोजित कर उन्हें डॉक्टर ऑफ़ लॉ की मानद उपाधि से विभूषित किया था । उस समय काशी महाराज विभूति नारायण सिंह भी उपस्थित थे । इस बोधमाला व्याख्यान सत्र की अध्यक्षता कर रहीं जामिया मिल्लिया इस्लामिया नई दिल्ली से नेल्सन मंडेला सेन्टर फ़ॉर पीस एण्ड कोंफ्लिक्ट रेज़ोल्युशन की विद्वान आचार्या और डाइरेक्टर प्रो. कौशिकी ने कहा कि नेल्सन मंडला के सम्पूर्ण जीवन के घटनाक्रम को देखें तो उसमें शिक्षा का बहुत महत्त्व देखतें हैं ।

प्रो. कौशिकी ने आगे कहा कि रंगभेद को दक्षिण अफ़्रीका से समाप्त करने वाले मंडेला के अन्दर क्षमाशीलता, उद्देश्य के प्रति स्पष्टता और अदम्य सहास; ये उनके व्यक्तित्व के वो गुण हैं जो उन्हें महान बनाती हैं । भारत रत्न (1990) नेल्सन मंडेला से नई पीढ़ियाँ बहुत कुछ सीख सकती हैं । सत्र की संचालिकता एसकेएमयू (दुमका) साहेबगंज कॉलेज के राजनीति विज्ञान विभाग की सहायक प्राध्यापिका डॉ. मेघा कुमारी थीं । इस अवसर पर वनस्पति शास्त्री प्रो. विद्यानाथ झा ने भी कार्यक्रम में भाग लिया ।