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90 के दशक में जलवा और शान-शौकत की पहचान थी ‘चांद-बिजली’ की नाच

#चांद_बिजली_का_नाच

नब्बे के दशक में शाहाबाद इलाके में चांद बिजली का नाच हर किसी के जुबान पर था शादी विवाह के मौके पर यह नाच करवाना समाजिक रुप से बहुत प्रभुत्व की निशानी थी। इस बात से लोगों की हैसियत आके जाने लगी थी कौन अपने यहां इस नाच का आयोजन करवाता है। इस नाच का क्रेज इतना ज्यादा था कि जिस तारीख में नाच का सट्टा नहीं हुआ रहता था इस तारीख पर तिलक और शादी की तारीख रखी जाती थी यह बातें पिछले दिनों बिजली रानी ने बातचीत के क्रम में बताया था 24 लोगों का समूह था जिसमें महिलाएं लड़कियां और पुरुष नर्तक शामिल थे साज बाज वाले अलग थे सबसे ज्यादा डिमांड कॉमेडियन जिसे भोजपुरिया इलाके में लबार कहा जाता है का था। रोहतास कैमूर सासाराम औरंगाबाद आरा बक्सर साथी साथ बिहार के अन्य भोजपुरिया इलाके से भी डिमांड आई थी नेपाल से लेकर उत्तर प्रदेश तक में आयोजन होते थे की कलाकारों का सम्मान था पैसा भी था और रुतबा भी जिसके यहां जाती थी यह उसकी प्रतिष्ठा होती थी कि कलाकारों के साथ किसी भी तरह का छेड़छाड़ या अभद्रता नहीं हो। बिजली रानी कहती है कि भोजपुरी में खास तरह के गीत भी होते थे जो सिर्फ शादी ब्याह में ही गए जाते थे जिसमें सेहरा नजराना शुक्रिया गीत अलग तरह के थे।

उनके मंडली के लाबार श्री भगवान शर्मा बाद में काफी चर्चित हो गए। जो महिलाएं या लड़कियां काम करती थी वह सभी सासाराम आरा में ही रहती थी विशेष अवसरों पर बनारस से भी कलाकारों को बुलाया जाता था। उसे जमाने में 51000 न्यूनतम शुल्क था बाद में टी सीरीज जैसी कंपनियों ने उनके नाच कार्यक्रम को रिकॉर्ड करके वीडियो के माध्यम से पूरे देश दुनिया में पहुंचा दिया। पहले बारात तीन दिनों का होता था और इस हिसाब से नाच भी तीन दिनों तक जमा रहता था बाद में यह दो दिनों का कार्यक्रम हो गया। गांव से दूरी पर होता था बारात का ठहराव मंच के नाम पर चौकिया होती थी लाइट के नाम पर पेट्रोमैक्स। कलाकार नाच के साथ ही साथ गीत भी गाते थे।

#अनूप