-लोकतंत्र के मंदिर की हकीकत ! ‘माननीयों’ की सुख-सुविधा पर हर साल करोड़ों रू का खर्चा…पर विधान मंडल में प्रति वर्ष 10% कार्य दिवस भी विधायी कार्य नहीं करते ‘माननीय’
सम्वाददाता। पटना।
राज्य का विधान मंडल लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंदिर होता है. यहीं से आम जनता के लिए नियम-कानून बनाए जाते हैं. केन्द्र की तरह ही कानून बनाने का काम विधान मंडल द्वारा किया जाता है। कुछ राज्यों में विधान मंडल के दो सदन हैं जबकि कुछ राज्यों में एक सदन है। बिहार में दो सदन… विधान सभा और विधान परिषद है. बिहार में समय के साथ सदन की बैठकों की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है. बिहार विधान परिषद की 2005 से लेकर 2023 तक की बात करें तो सबसे कम 2005 में महज 5 बैठकें हुई थी, जबकि 2013 में सबसे अधिक 39 बैठक हुई. माननीयों की सुख सुविधा पर हर साल करोड़ों रू खर्च किए जाते हैं, लेकिन विधानमंडल की बैठक कुल कार्य दिवस की 5-10 % भी नहीं होती।
बिहार के जाने-माने आरटीआई एक्टिविस्ट शिवप्रकाश राय ने 2005 से लेकर अब तक विधान परिषद की हुई बैठक के बारे में जानकारी मांगी थी. परिषद सचिवालय ने 17 मई 2023 को इस संबंध में जानकारी दी है. इसके अनुसार 2005 में विप की सिर्फ 5 बैठकें हुई थी. हालांकि 2005 में विधानसभा के 2 चुनाव हुए थे. स्थाई सरकार न होने की वजह से विधानमंडल की बैठक नहीं हो पाई थी. वहीं 2006 में 34, 2007 में 33, 2008 में 35, 2009 में 37, 2010 में 34, 2011 में 34, 2012 में 33 2013 में 39, 2014 में 34, 2015 में 36, 2016 में 35, 2017 में 34, 2018 में 32, 2019 में 33, 2020 में 14, 2021 में 32, 2022 में 34 और 2023 में अब तक 20 बैठकें हुई है।

आरटीआई एक्टिविस्ट शिवप्रकाश राय कहते हैं कि सूचना के अधिकार के तहत ये जानकारी लगी है कि कुल कार्यदिवस का पांच-दस फीसदी भी विधानमंडल की बैठकें नहीं होती है. जब बैठक हुई नहीं तो विधायी कार्य क्या होगा…। जबकि प्रति वर्ष माननीयों पर आम जनता का करोड़ों रू खर्च किए जाते हैं।










