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लोकआस्था और भाई-बहन के प्रेम का पर्व — मिथिला में उमंग के साथ मनाया जा रहा सामा-चकेवा

-लोकआस्था और भाई-बहन के प्रेम का पर्व — मिथिला में उमंग के साथ मनाया जा रहा सामा-चकेवा

मुजफ्फरपुर। दीपक कुमार तिवारी।

लोक आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम लिए मिथिला का प्रसिद्ध पर्व सामा-चकेवा पूरे उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। छठ पर्व के समापन के साथ ही गांव-गांव में महिलाएं इस लोकपर्व की तैयारी में जुट जाती हैं। शाम ढलते ही क्षेत्र के हाट-बाजारों में पारंपरिक शारदा सिन्हा के गीत गूंजने लगते हैं, तो आंगनों में बहनें मिट्टी की प्रतिमाओं को सजाने-संवारने में व्यस्त नजर आती हैं।

बन्दरा प्रखंड क्षेत्र सहित आसपास के इलाकों में मिट्टी से बनी सामा-चकेवा, चुगला, सतभैया, वृंदावन और अन्य पक्षियों की मूर्तियों की खूब बिक्री हो रही है। बाजारों में 60 से 80 रुपये तक की कीमत पर ये प्रतिमाएं बिक रही हैं। बरियारपुर हाट में मूर्तियां बेच रही काजल ने बताया कि छोटी, मध्यम और बड़ी मूर्तियों के अलग-अलग दाम हैं और महिलाओं में इसे खरीदने को लेकर जबरदस्त उत्साह है।

यह पर्व भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण की पुत्री सामा पर एक चुगले ने झूठा आरोप लगाया, जिससे क्रोधित होकर श्रीकृष्ण ने सामा को पक्षी बनने का श्राप दे दिया। बाद में भाई चकेवा ने अपनी बहन को मुक्त कराने के लिए कठोर तपस्या की, जिसके बाद सामा को पुनः मानव रूप प्राप्त हुआ। उसी स्मृति में मिथिला में हर साल यह पर्व मनाया जाता है।

पर्व के दौरान चुगले की प्रतिमा बनाकर उसकी चोटी में आग लगाकर प्रतीकात्मक दंड देने की परंपरा भी निभाई जाती है। बहनें अपने भाई को धान की नई फसल से बने चूड़ा-दही खिलाकर उसके दीर्घायु की कामना करती हैं।

पंडित मनोज झा एवं संजय पाठक बताते हैं कि सामा-चकेवा का उल्लेख पद्म पुराण में भी मिलता है। सात दिनों तक चलने वाले इस पर्व का समापन कार्तिक पूर्णिमा की रात सामा-चकेवा प्रतिमा के विसर्जन के साथ होता है। इस दिन महिलाएं गीत गाते हुए सजे हुए टोकरे में सामा-चकेवा को लेकर नदी-तालाबों तक जाती हैं और विधि-विधान से उनका विसर्जन करती हैं।

लोकपरंपरा, स्नेह और संस्कार से जुड़ा यह पर्व मिथिला की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है — जहां मिट्टी, संगीत और ममता मिलकर भाई-बहन के अटूट बंधन की कहानी कह रहे हैं।