मोतिहारी।मदन प्रसाद देवकुलियार।
कोरोना वायरस का अचानक प्रकोप हुआ और पूरे विश्व का समीकरण बदल गया।जिंदगी ठहर गई, छोटे-छोटे रोजगार बंद हुए और करोड़ों लोग बेरोजगार हुये। अमीरों की आर्थिक स्थिति पर कोई प्रभाव तो नहीं पड़ा लेकिन गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार के लोग जिन्होंने पेट काटकर कुछ पैसे बुरे वक्त के लिए रखे थे, धीरे-धीरे वे भी समाप्त हो गए। अब तो स्थिति दिनोंदिन और भयावह होती जा रही है।

इस बीच नई बात यह हुई कि भागदौड़ की जिंदगी जिसमे लोग ठीक से भोजन भी नहीं करते थे ,परिवार में बच्चों से दो मीठी बात भी नहीं कर पाते थे, पति पत्नी का रिश्ता भी धीरे धीरे व्यस्तता की बेदी चढ़ा हुआ था, वह दौर टूटा और घर में पति पत्नी मां बाप और बच्चे एक साथ रहने लगे। यह एक ऐसी नई सुखद अनुभूति लोगो को हो रही है जिसके लिए लोग तरस रहे थे ।बच्चे चाहते थे कि मेरे पापा घर में हमलोगो से खेलते । उनकी यह अरमान पूरी नहीं हो रही थी।घर मे बृद्ध मां-बाप जो घर में पड़े रहते है,उनसे कोई बात करने वाला नहीं था, कोरोना वायरस भले ही खतरनाक वायरस है,



लेकिन बहुत से घरों में इसने खुशहाली ला दी है, क्योंकि जिस खुशीऔर सुख के लिए लोग भागदौड़ करके धन कमाते थे,भले वे काफी धन कमा लेते हैं लेकिन घर में खुशी और सुख गायब रहती थी।कभी कुछ ज्यादा समय मिलते भी थे तो एक दूसरे से गिले-शिकवे में ही समाप्त हो जाते थे। लॉकडाउन एक तरह से उन लोगों के लिए वरदान साबित हो रहा है ।रिश्ते को प्रकट करने में उसकी अहम भूमिका हो रही है बच्चों को मां बाप का प्यार अधिक मिल रहा है लेकिन कहीं-कहीं इसका दूसरा रूप भी सामने आ रहा है ।


जिस घर में पति पत्नी में आपसी मनमुटाव लड़ाई झगड़े होते थे ,वहां झगड़े और बढे हैं।कही कही बहुत हिंसक रूप भी लेता जा रहा है ।सिक्के के दो पहलू होते हैं लेकिन ज्यादातर घरों में बच्चों को खुशी है,पत्नी को खुशी है कि हम लोग दिन भर इकट्ठे रहते हैं ।भले ही पत्नी के ऊपर लोड अधिक पड़ा है बच्चों की फरमाइश भी हो रही है खाने के लिए अलग आइटम की।पति की भी।फरमाइश होती है लेकिन ज्यदातर पत्नी को इसमें कोई नाराजगी नहीं होती है ।कहीं कहीं नाराजगी भी होती है लेकिन बहुत से घरों में देखा गया कि सुखद माहौल बना है। करोना का भय घरों मे बच्चों की किलकारीयों के बीच गुम हो चुका है।

इसी विषय पर चंद लोगों से उनके अनुभव को लिया गया प्रस्तुत है उनकी बातें उनकी जुबानी—-
ऋचा कुमारी ने कहा कि कोरोना से काफी डर लगता है,लेकिन आपसी संबंध में ऐसा बदलाव आया है जिसकी कल्पना हमने कभी नहीं की थी। घर में छोटे-छोटे बच्चे हैं जो कभी पापा- पापा की रट लगाते रहते थे उसके पापा के माता-पिता भी अपने पुत्र से मन भर बात करना चाहते थे ।वे यह चाहते थे कि मेरा बेटा मेरे पास बैठे और हम उसे घंटो घंटो बाते करें ,मुझे भी अपने पति से अपनी व्यथा सुनाने की प्रबल इच्छा रहती थी मगर पति जी महाराज का दर्शन दुर्लभ रहता था ।अगर दिन में आवे भी तो इधर उधर की व्यस्तता बता कर गायब हो जाते थे, शुक्र है

करो ना जी का अब बच्चे भी खुश ,बच्चे के पापा के पापा भी खुश और मुझे मन के अंदर दबे हुए उबाल को निकालने का एक अच्छा अवसर मिला है। पति की हालत ऐसी कि बाहर जाए तो प्रशासन का भय और मजबूरन घर के प्रशासन से अब उनको समझौता करना पड़ रहा है। इसी कशमकश में हम लोग जी रहे है। रजनी भूषण किशोर जी अपने अनुभव सुनाते हुए कहते हैं कि सामाजिक संबंध में गिरावट आई है परंतु घरेलू संबंध बहुत ही प्रगाढ़ हुए है। पति पत्नी के अलगाव और दूरी कम हुई है। घर में रहने से आपसी शिकवा शिकायत भी दूर हुए हैं ।पत्नी जो बार-बार कहती थी कि मेरे लिए आपके पास समय बिल्कुल नहीं है यह कहना अब पत्नी का खत्म हुआ है।खुद भी बच्चों के साथ इतना समय रहने से अब बहुत ही खुशी रहती है

ज्यादा समय बाहर रहने से आपसी शक सुभा भी हो जाती थी। गलतफहमी का शिकार होना पड़ता था ।अब इन सभी चीजों का निराकरण हो गया। पत्नी का विश्वास और भरोसा भी बढ़ा है। खाना बनाने में अगर ऐसी बात नहीं की सिर्फ पत्नी ही बनाएगी। अब किसी भी घरेलू काम में अब बटवारा का लकीर मिट गया अब हम दोनों एक दूसरे का सहयोग करते हैं और कामों का बंटवारा भी खुशी-खुशी आपस में कर रहे हैं।
नरेंद्र सिंह ने अपने अनुभव में कहा कि कहने को तो सभी अपने हैं परंतु अपनापन समाप्त है, बच्चे परेशान हैं, पढ़ाई समाप्त हैं, बच्चे बाहर घूमने के लिए बेचैन है ।पहले बाहर रहते हुए घर की चिंता लगी रहती थी अब घर में रहकर बाहर की चिंता रहती है। सभी जानते हैं

औरतें ज्यादा बोलती है पहले सुनने वाला बाहर भागा भागा रहता था अब तो कोरोना ने औरतों का साथ दिया है। घर मे पुरानी पुरानी और खरी-खोटी बातें सुनने की अब हमारी विवशता है। पत्नी ज नित गड़े गड़े मुर्दे को उखाड़ करके प्रताड़ित करती रहती है ।घर मे बन्द रहने से खुशी कम तनाव ज्यादा मिल रही है।डाक्टर तनाव मुक्त रहने को कहता है और कोरोना की सहेली पत्नी कहती है कि तुम को सुनना ही है।इससे तनाव बढ़ता जा रहा है। कोरोना अगर पकड़ लेता है तो पूरा शहर जान जाता है ,लेकिन पत्नी की प्रताड़ना से मिली तनाव स्वयं के अलावा और कोई नहीं जानता है।


पूर्णिमा गुप्ता ने अपने मन की बात को रखते हुए कहा कि घर से लेकर गांव की बात सुनने के लिए पहले पति महोदय के पास समय उपलब्ध नहीं रहता था। कोरोना ने इसका समाधान निकाल दिया अब दिन भर जो चाहे जब चाहे आराम से कोई भी बात शुरू कर लेता है और समय की कोई सीमा भी नही रहती। लॉकडाउन जब लगा तो कुछ दिन तो अच्छा लगा क्यो कि वर्षो का दबा हुआ भड़ास निकालने का आछा मौका मिला।पूरी बातो को उगलने का अच्छा मौका मिल गया ,लेकिन अब मन ऊब गया है। अब कुछ भी पुरानी बात रही नही सब निकल गई नया बन नही रहा।दोनो कुछ ज्यादा सहनशील हो गये है। बाहर में आना जाना बंद है जिसके कारण तनाव बढ़ता जा रहा है। मैं तो चाहती हूं कि करोना की दवा जल्द से जल्द आ गई कि हम लोग इस कैद खाने से मुक्त हो आजाद हो जाए।












