-भारत कला भवन में प्रदर्शित चोल कांस्य नटराज प्रतिमा: उत्तर–दक्षिण सांस्कृतिक एकता का जीवंत प्रतीक
वाराणसी।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय स्थित भारत कला भवन में काशी तमिल संगमम 4.0 के तहत पहुंचे प्रतिनिधिमंडल ने चोल कालीन कांस्य नटराज प्रतिमा के ऐतिहासिक महत्व को गहराई से सराहा। सन् 1956 में तमिलनाडु के तत्कालीन राज्यपाल श्री प्रकाश द्वारा संग्रहालय को उपहार स्वरूप दी गई यह अनुपम प्रतिमा न केवल दक्षिण भारतीय कला की अद्वितीय धरोहर है, बल्कि उत्तर और दक्षिण भारत के सांस्कृतिक संवाद का जीवंत सेतु भी मानी जाती है।

प्रतिनिधियों ने नटराज प्रतिमा को ध्यानपूर्वक निहारते हुए भारतीय मूर्तिकला परंपरा, चोल शासकों की उत्कृष्ट शिल्पकला और शैव दर्शन की गहनता को अनुभव किया। उन्होंने कहा कि यह प्रतिमा कला एवं संस्कृति के निरंतर आदान–प्रदान का प्रतीक है, जिसने काशी और तमिल परंपराओं के संबंधों को और मजबूत किया है।
भारत कला भवन के अधिकारियों के अनुसार, यह कांस्य नटराज प्रतिमा संग्रहालय की सर्वाधिक प्रतिष्ठित कलाकृतियों में से एक है और भारतीय सांस्कृतिक एकात्मता के मूल विचार को मूर्त रूप प्रदान करती है।
काशी तमिल संगमम के आगंतुकों ने इस धरोहर को देखना “ऐतिहासिक, प्रेरणादायी और अविस्मरणीय अनुभव” बताया तथा इसके संरक्षण और प्रसार के प्रयासों की सराहना की।










