-एहू बेरी छठ पर नहीं आए — परंपरा और ममता के बीच झूलता परदेस का बेटा
दीपक कुमार तिवारी।मुजफ्फरपुर।
चार दिवसीय छठ के पर्व की शुरुआत शनिवार को नहाय खाय के साथ हो गयी है। चारों ओर तैयारी का माहौल है — घाटों की सफाई, घरों में पूजा की व्यवस्था और गांव के घर-आँगन में गूंजते छठ गीत। लेकिन इन सबके बीच एक दर्द भी है — “एहू बेरी छठ पर नहीं आए”। यह सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि हर उस बेटे-बेटी के दिल की टीस है जो अपने गांव, अपनी मिट्टी और अपनी माई से दूर शहरों में नौकरी की मजबूरियों में बंधे हैं।
प्रखण्ड के सकरी मन गांव का अमित दिल्ली में रहता है।उसने कॉल पर बातचीत में बताया कि “माई का फोन आया था,” वह कहता है — “कह रही थीं कि बाबू एहू बेरी छठ पर नहीं आए। तुम्हरे बिन छठ पर कुछ भी अच्छा नहीं लगता। अइसन नौकरी काहे करते हो, जहां छठ पर छुट्टी न मिले।मिथलेश देवी कहती है कि उनका भतीजा यूपी और कोलकाता में बैंककर्मी है।जब जॉब नहीं थी तो छठी माई से अर्जी लगाने को कहता था।अब जॉब के बाद छठ में गांव आना बंद कर दिया।इससे चाची दुखी है। कहती हैं कि नौकरियो त छठिए माई के दिहल है।”सन्दरस देवी अपने इंजीनियर पोते के छठ में घर नहीं आने पर काफी उदास है।

बहरहाल क्षेत्र के उन हज़ारों परदेसियों के लिए यह संवाद किसी तीर की तरह चुभता है। जो लोग छठ के गीत सुनकर बेचैन हो उठते हैं, जैसे गाय के हंकरने पर बछरू व्याकुल हो जाता है।
रिटायर्ड डाककर्मी मुकुंद द्विवेदी एवं ग्रामीण चिकित्सक कृष्ण कुमार तिवारी ने बताया कि पैसे कमाने और बेहतर जिंदगी की तलाश में शहरों का रुख करने वाला आदमी धीरे-धीरे अपनी जड़ों से कटने लगता है। मां-बाप, भाई-बहन, रिश्ते-नाते सब पीछे छूट जाते हैं। शहर की चकाचौंध और नौकरी की बेड़ियां उसे इस कदर जकड़ लेती हैं कि वह भूल जाता है — जिस मिट्टी ने उसे बड़ा किया, वही उसे हर छठ पर पुकारती है।
मुखिया रंजीत सिंह बताते हैं कि छठ सिर्फ पूजा नहीं, यह मातृ-भाव और माटी से जुड़ाव का त्योहार है। चाहे व्यक्ति कहीं भी हो — अमेरिका में, दिल्ली में या मुंबई की किसी गली में — छठ आते ही दिल गांव की ओर उड़ जाता है।
बहरहाल “एहू बेरी छठ पर नहीं आए” — यह वाक्य हर साल अनगिनत माताओं के होंठों पर आता है और हजारों बेटों के दिलों में दर्द बनकर रह जाता है।
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