-हर्ष फायरिंग से सजा तक: राजू कुमार सिंह की विधायकी कैसे गई और अब आगे क्या होगा?
दीपक कुमार तिवारी।मुजफ्फरपुर।
दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट द्वारा बिहार के साहेबगंज से भाजपा विधायक एवं पूर्व मंत्री डॉ. राजू कुमार सिंह को वर्ष 2018 के चर्चित हर्ष फायरिंग मामले में चार वर्ष के कारावास की सजा सुनाए जाने के बाद बिहार की राजनीति में बड़ा भूचाल आ गया है। अदालत ने गैर-इरादतन हत्या के मामले में दोषी ठहराते हुए न केवल सजा सुनाई, बल्कि मृतका के पति को 25 लाख रुपये मुआवजा देने का भी आदेश दिया। इस फैसले के साथ ही जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8(3) के तहत उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त होने की स्थिति बन गई और साहेबगंज विधानसभा सीट पर उपचुनाव का रास्ता साफ हो गया।
यह मामला 31 दिसंबर 2018 की रात दिल्ली के वसंत कुंज स्थित एक फार्महाउस में आयोजित नववर्ष समारोह से जुड़ा है। आरोप था कि जश्न के दौरान की गई हर्ष फायरिंग में चली गोली महिला चिकित्सक डॉ. अर्चना गुप्ता को लगी थी। गंभीर रूप से घायल डॉक्टर की तीन दिन बाद इलाज के दौरान मौत हो गई। लंबे न्यायिक प्रक्रिया के बाद अदालत ने पहले उन्हें दोषी करार दिया और अब चार वर्ष की सजा सुनाते हुए कानूनी प्रक्रिया को निर्णायक मोड़ तक पहुंचा दिया।
भारतीय लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 बनाया गया है। इस कानून की धारा 8(3) स्पष्ट करती है कि यदि किसी सांसद या विधायक को किसी आपराधिक मामले में दो वर्ष या उससे अधिक की सजा सुनाई जाती है तो वह दोषसिद्धि की तारीख से ही सदन की सदस्यता के लिए अयोग्य हो जाता है। वर्ष 2013 में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक लिली थॉमस बनाम भारत संघ फैसले ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि सजा मिलने के बाद अपील के लिए मिलने वाली राहत के आधार पर सदस्यता बरकरार नहीं रखी जा सकती। यानी दोषसिद्धि के साथ ही सदस्यता स्वतः समाप्त मानी जाती है।

राजू कुमार सिंह का राजनीतिक सफर जितना प्रभावशाली रहा, उतना ही विवादों से भी घिरा रहा। उच्च तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने दवा कारोबार में अपनी पहचान बनाई और फिर राजनीति में प्रवेश किया। वे बिहार सरकार में मंत्री भी रहे और उत्तर बिहार के प्रभावशाली नेताओं में उनकी गिनती होती रही। लेकिन अदालत के इस फैसले ने उनके राजनीतिक भविष्य पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। मौजूदा सजा के कारण वे न केवल अपनी विधानसभा सदस्यता खो देंगे, बल्कि सजा पूरी होने के बाद भी अगले छह वर्षों तक चुनाव लड़ने के अयोग्य रहेंगे।
अब आगे की प्रक्रिया पूरी तरह संवैधानिक और कानूनी होगी। अदालत के आदेश की प्रति बिहार विधानसभा सचिवालय को भेजी जाएगी, जिसके बाद साहेबगंज विधानसभा सीट को आधिकारिक रूप से रिक्त घोषित किया जाएगा। इसके बाद निर्वाचन आयोग उपचुनाव की प्रक्रिया शुरू करेगा। यदि विधानसभा का शेष कार्यकाल एक वर्ष से अधिक है, तो कानून के अनुसार छह महीने के भीतर उपचुनाव कराया जाना आवश्यक होगा।
यह फैसला केवल एक जनप्रतिनिधि की सजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि कानून के सामने कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो, समान रूप से जवाबदेह है। लोकतंत्र की मजबूती इसी सिद्धांत पर आधारित है कि सार्वजनिक पद पर बैठे लोगों के लिए कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी दोनों सर्वोपरि हैं। आने वाले दिनों में साहेबगंज विधानसभा क्षेत्र की राजनीति, भाजपा की रणनीति और उपचुनाव के समीकरण बिहार की राजनीति का प्रमुख केंद्र बनने की संभावना है।












