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स्पेशल/ मिथिला का धरोहर : राजासल्हेश

-मिथिला का धरोहर : राजासल्हेश

 

जनकपुरधाम/मिश्रीलाल मधुकर।

 

सल्हेशका जन्म प्राचीनमिथिला राज्य के मोरंग क्षेत्र अब नेपाल के महिसौथा गांव में हुआ था।राजा सल्हेश को मिथिला के गांव में सर्वजातीय श्रद्धा एवं प्रतिष्ठा प्राप्त है।उनके पिता का नाम सोमदेव और माँ का नाम शुभ गौरी थी। उनका विवाह विराट नगर के राजा श्री हलेश्वर की बेटी सत्यवती से हुआ था।
इतिहासकार के अनुसार, सलहेस ‘शैलेश’ का स्थानीय भाषा में अर्थ होता है ‘पर्वतों का राजा’
राजा जनक के उपरांत राजा सलहेस के शासनकाल में मिथिला में सराहनीय उपलब्धि हुई।

यह ऐतिहासिक तथ्य है कि राजा जनक के उपरांत पांचवीं और छठी शताब्दी तक मिथिला में वज्जिसंघ, लिच्छवी, नंद, सुनगा, कांत, गुप्ता, वर्धन इत्यादि का शासन रहा, पर इस अवधि में मिथिला कोई विशेष उपलब्धि नहीं पा सका। इन्होंने मिथिला की राजधानी महिसौथा-सिरहा (नेपाल) को बनाया।लोकश्रुति के अनुसार राजाजी सलहेस महिसौथा राज से हाथी पर सवार होकर पतारी पोखर में स्नान करते थे और वहां से आगे फुलवारी से सामरूय फूल तथा माणिकदह से कमल फूल लेकर भगवानपुर स्थित मंदिर में भगवती बालासुंदरी की पूजा करते थे। वहां एक प्राचीन किले का भग्नावशेष अभी भी दिखाई देता है। लोकगाथा विवेचक के मतानुसार-‘राजा सलहेस शक्ति, शील और सौंदर्य-तीनों गुणों से परिपूर्ण थे। राजा सलहेस घोड़ा पर बैठकर अपनी प्रजा की रक्षा तथा शिकार खेलने निकला करते थे। जिस सरिवन में राजा सहलेस विचरण किया करते थे उसका संबंध मधुबनी जिले में बाबू बरही प्रखंड से है। राजा सलहेस ने अपने राज्य को उत्तर की ओर से चीन,भूटान
तिब्बतियों के आक्रमण से कई बार बचाकर और विजय प्राप्त कर अपने नाम ‘शैलेश’ (पर्वतों का राजा) को सार्थक किया।”
नेपाल के तराई क्षेत्र एवं पूर्वोत्तर बिहार की सभी गांव में में राजा सलहेस की याद में हरेक वर्ष वैशाख पूर्णिमा को मेले का आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर ‘राजा सलहेस’ नामक नृत्य नाटिका, जिसे स्थानीय भाषा में ‘नाच’ कहा जाता है, की प्रस्तुति स्थानीय लोक गायक मंडली के द्वारा नृत्य व गायन के साथ की जाती है। यह ‘नाच’, जिसमें राजा सलहेस की जीवनी है, को किसी भी उत्सव के अवसर पर कराया जाता है।
राजा सलहेस चारों वेदों के ज्ञाता थे , राजा सलहेस की नैतिकता और राजाओं के खिलाफ लड़ाई जीतकर उसने जो सम्मान अर्जित किया, वह गर्व का एक प्रमुख स्रोत है।मिथिला पुजारी के अनुसार नई फसल का संग्रह खलिहान में होने पर राजा सलहेस के नाम पर उसका कुछ अंश अलग कर किसी निर्धन को दान दिया जाता है।राजा सलहेस की प्रतिमा, घोड़े पर आसीन हाथ में तलवार लिए, देखा जाता है जो प्राय: गांव के अंतिम छोर पर स्थापित किया जाता था। लेकिन अब सभी गांव की बस्ती में राजा सलहेस का गह्वर स्थापित है!दुसाध इसे कुल देवता मानते हैं।