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स्पेशल: प्रणाम! भीख मांगकर भी आपको पूजूंगा…

-प्रणाम! भीख मांगकर भी आपको पूजूंगा …

(छठ को यहां से, ऐसे देखिये).
# समर्पण : आदमी का अनगढ़ लोकाचार, जब बिल्कुल निश्चल भाव में, प्रकृति में पूर्णतः समाहित होता है; उसका शरणागत बनता है, तो छठ कहलाता है।
# निश्चल जिद : इस महापर्व की महाआस्था का एक बहुत गाढ़ा रंग उस जिद का है, जो भीख मांगकर भी इस पर्व को साकार करने के रूप में प्रचलित है। यह अदने से आदमी की परम सत्ता के प्रति चरम समर्पण व एकाकार होने का यह पुरजोर आग्रह है कि ‘तुमने मुझे पूजन सामग्री लेने लायक भी न बनाया, तो क्या हुआ, मैं भीख मांगकर भी तुम्हारी पूजा करूंगा।’ और जब भक्त इतना दृढ़ निश्चयी हो, तो उसकी मनोकामना पूरी होनी ही है।
# बेधड़क आग्रह : … और भक्त इसी बेधड़क भाव में अपना आग्रह निवेदित करता है। फिर चाहे वह बेटा-बेटी की चाह हो या दामाद की। हर तरह के निवेदन के बहुत सुंदर, मधुर गीत हैं। मसलन …
“मांगिला तोसे वरदान हे छठी मईया, मांगिला तोसे वरदान।
राम जइसन बेटा दीह बेटी सीता समान।।”
बेटी के लिए दोयम दर्जा की समझ रखने वाला पुरुष प्रधान समाज छठी मईया, सूर्य भगवान से बेटी मांगता है …
“रुनकी-झुनकी बेटी मांगिला, पढ़ल पंडितवा दामाद।”
# उम्मीद : छठ, आदमी (खासकर बिहारियों) की उम्मीदों का सूरज है। क्योंकि हम इस दिन उम्मीदें बोते हैं, साल भर उसे अपनी मेहनत से सींचते हैं, और बहुत मायनों में इसी दिन इसकी लहलहाई फसल को उपयोग के काबिल बनाते हैं। इसीलिए छठ, हरेक मनोकामना के पूरी होने की उत्कट अवामी/दुनियावी धारणा है।


# स्वयं-साक्षात : यह दुनिया का इकलौता ऐसा धार्मिक लोक आयोजन है, जिसमें भक्त और भगवान के बीच कोई नहीं होता। कोई घोषित मंत्र, पुरोहित नहीं।
# लोक-सहकार : लोक आयोजन इसलिए भी कि इसका भागीदार पूरा समाज, हर तबका होता है। डोम, बांस का सूप-दऊरा उपलब्ध कराता है तो कुम्हार मिट्टी का दीया-कोसी; पटवा/पटहेरीन अरता-बद्धी देता है, तो माली के घर से फूल आता है।
# विश्वास : छठ, सिर्फ महापर्व नहीं, बल्कि हमारी जीवन शैली का आधार है। एक शब्द में बिहार की पहचान करनी-कहनी हो, ताे छठ काफी है। इसलिए तो जहां- जहां बिहारी, वहां-वहां छठ। पर्याय, पूरक से। बहुतों ने सीखा। बहुत जल्द दुनिया के तमाम देश, इस सीख के दायरे में होंगे। इसके लगातार विस्तार का एकमात्र कारण है-छठी मईया एवं साक्षात भगवान सूर्य की शक्ति, जो विश्वास दिलाती है कि कोई भी काम हो, इनके आशीर्वाद से हो ही जाएगा। इसी विश्वास के साथ हर आदमी छठ घाट को निकलता है, लौटता है; और अपनी मनोकामना को मंजिल हासिल करने तक जीता है।
# साहचर्य : छठ के लोक पर्व कहलाने का मूल यही है कि जिसने व्रत नहीं किया या जिसके घर व्रत नहीं हुआ है, वह भी खुद को इस पर्व से किसी न किसी रूप में जोड़ लेता है। कुछ नहीं, तो घर के सामने की सड़क को ही बुहार कर, उस पर पानी की फुहार मार देता है। नगरीय व्यवस्था को कोसती रहने वाली आबादी इस दौरान अपने काम, अपनी सक्रियता से उसे री-प्लेस सी कर देती है। आटा चक्की वाले प्रसाद के लिए मुफ्त में आटा पीसकर अपना योगदान करते हैं, तो जिनके यहां फल-सब्जी-दूध है, वे इसे छठ व्रती के यहां पहुंचा देते हैं। व्रती का पैर धोने, उनके वस्त्र साफ करने की होड़ मचती है। नहाय-खाय से पारण तक, कुल चार दिनों के दौरान, छठ साहचर्य के ऐसे अनगिनत दृश्यों को प्रस्तुत करने का सार्थक अवसर है। हर जुबान पर आस्था घुली मिठास ।
# संस्कार : यही है अपना बिहार, जहां छठ, महापर्व से बहुत आगे निकल संस्कार बन चुका है। ऐसा संस्कार, जिसकी बुनियाद निष्ठा, समर्पण, आस्था, सात्विकता जैसी तमाम स्थितियां हैं। देश-दुनिया में रचे-बसे 75 फीसदी से अधिक बिहारी हर साल छठ में नई उम्मीद और मनोकामना लेकर जन्मभूमि पर आते हैं और जीवन संघर्ष में जीत के लिए नई ऊर्जा लेकर कर्मभूमि को लौट जाते हैं।
# संयम-सात्विकता : छठ के केंद्र में संयम, पवित्रता, सात्विकता है। सूप में पैर सटा, तो कान पकड़कर सीधे उट्ठक-बैठक। हर स्तर पर माफी का मनोभाव …
“पहिले-पहिले हम कईलीं छठी मईया बरत तोहार,
करिह क्षमा छठी मईया भूल-चूक गलती हमार।”
# जीवन चक्र : छठ, बहुत सार्थक नसीहत है। यह जीवन चक्र बताता है। यह कि जो अस्त होता है, उसका उदय होना ही है। और यह भी कि जिसका उदय हुआ है, उसे अस्त होना ही है। सिम्पल।
# पीढ़ी निर्माण : छठ, पीढ़ियां बनाता है; विस्तारित होता जाता है। उम्र या फिर दूसरे कारणों से इसे नहीं कर पाने की असमर्थता में, अमूमन एक पीढ़ी माफी मांगते हुए, इसे दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित देती है। फिर दूसरी, तीसरी को।

प्रस्तुति: अनूप।