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श्रीमद्भागवत केवल ग्रंथ नहीं, जीवन जीने की कला है : स्वामी लक्ष्मणाचार्य

-श्रीमद्भागवत केवल ग्रंथ नहीं, जीवन जीने की कला है : स्वामी लक्ष्मणाचार्य

मुजफ्फरपुर। सकरा प्रखंड के फिरोजपुर में आयोजित श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञानयज्ञ के तृतीय दिवस पर हरिहरक्षेत्र पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी लक्ष्मणाचार्य जी महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि श्रीमद्भागवत केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाली दिव्य मार्गदर्शिका है। यह भटके और उलझे हुए जीवन को सुलझाने के लिए पर्याप्त है।

उन्होंने कहा कि यदि मानव जीवन से शास्त्रों को हटा दिया जाए तो मनुष्य और पशु के बीच का अंतर समाप्त हो जाएगा। शास्त्रों से ही धर्म का ज्ञान प्राप्त होता है और धर्म ज्ञान ही मनुष्य को श्रेष्ठ बनाता है। धर्म के अभाव में मनुष्य का आचरण पशुवत हो जाता है।

स्वामी जी ने वृद्धावस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि जरा अवस्था मृत्यु का अग्रदूत है। इस अवस्था में शरीर के अंग शिथिल हो जाते हैं, दांत और बाल साथ छोड़ देते हैं तथा व्यक्ति को लाठी का सहारा लेना पड़ता है। इसके बावजूद मनुष्य की आशाएं समाप्त नहीं होतीं। उन्होंने कहा कि जब तक व्यक्ति धन अर्जित करने में सक्षम रहता है, तब तक परिवार का स्नेह और सम्मान मिलता है, लेकिन वृद्धावस्था आने पर अक्सर उसकी बातों को अनसुना कर दिया जाता है।

प्रवचन के दौरान उन्होंने कहा कि जिस प्रकार जल सूख जाने पर तालाब का अस्तित्व समाप्त हो जाता है, उसी प्रकार धन-संपत्ति नष्ट होने पर संसार और परिवार का मोह भी समाप्त हो जाता है। इसलिए जीवात्मा को पूर्ण समर्पण भाव से भगवान की शरण ग्रहण करनी चाहिए।

स्वामी लक्ष्मणाचार्य जी ने महात्मा ध्रुव की कथा का वर्णन करते हुए कहा कि संसार में बहुत कुछ प्राप्त किया जा सकता है, लेकिन सहोदर भाई का स्थान कोई नहीं ले सकता। उन्होंने लोगों को भाई की संपत्ति हड़पने जैसे कृत्यों से बचने की सीख देते हुए कहा कि ऐसे पापों का परिणाम अत्यंत दुखद होता है और उसका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों तक पड़ता है। पाप से अर्जित धन अंततः पाप में ही नष्ट हो जाता है।

उन्होंने महात्मा जड़भरत के चरित्र का भी विस्तार से वर्णन किया। इस दौरान ध्रुव की आकर्षक झांकी का दर्शन श्रद्धालुओं ने किया। कार्यक्रम के अंत में भागवत जी की आरती हुई तथा श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद का वितरण किया गया।

इस अवसर पर अमरेश कुमार सिंह, वरुण कुमार सिंह, श्रीलाल पाठक, लाला सिंह, बीरेन्द्र शास्त्री, शिवनारायण शास्त्री, विवेकानंद झा, गोपाल झा सहित आसपास के गांवों से पहुंचे सैकड़ों श्रद्धालु एवं श्रोता उपस्थित रहे।