-‘भूल चूक क्षमा करीह एहो दीनानाथ..धनिया हमर नया बाड़ी हो’
-पारंपरिक छठ गीतों का कोई तोड़ नहीं
-छठ महापर्व स्वतः बना है ब्रांड
-गांव-गांव,घाट-घर बज रहे शारदा सिन्हा के कर्णप्रिय छठ गीत
दीपक कुमार तिवारी/अनूप नारायण। पटना/मुजफ्फरपुर।
‘भूल चूक क्षमा करीह एहो छठी माई की धनिया हमार नया बाड़ी हो….’
शारदा सिन्हा के’हे दीनानाथ..एहिला दुअरवा धइले ठार..” आदि छठ गीतों के बाद इस गीत ने कहीं ना कहीं मन को झंकृत किया है। गीत में उस पति की वेदना है,जिसकी पत्नी छठ के नेम विधि को नहीं जानती और व्रत करने का जिद पाल रखी है। छठी मैया के कृपा से पर्व के अनुष्ठान की तैयारी है और एक-एक सामग्री जुटाई जा रही है। पति छठी मैया से गुहार करता है कि अगर कोई गलती हो तो क्षमा कर दीजिएगा। यूं तो हिंदू धर्म शास्त्रों में छठ अनुष्ठान के 12 महीने का प्रावधान है पर बिहार में चैत्र और कार्तिक मास में छठ का अनुष्ठान व्यापक पैमाने पर किया जाता है। कार्तिक महीने में होने वाला छठ महापर्व के रूप में सामने आता है। बिहार ही नहीं पूरे देश दुनिया में जहां कहीं भी बिहारी रचे बसे हैं, वहां छठी मैया का व्रत किया जाता है।पंडितों एवं जानकारों का बताना है कि पूरी दुनिया के किसी भी सभ्यता में डूबते हुए सूर्य की पूजा का प्रावधान नहीं है,बिहार में यह सदियों पुरानी सनातन परंपरा है कि डूबते हुए सूर्य को भी पूजा जाता है। इस आशा में कि अगले दिन सुबह नए सूर्य का उदय होगा। वर्ती मिथलेश देवी,सन्दरा देवी आदि बताती हैं कि छठ ऐसा महापर्व है। जिसके अनुष्ठान में किसी व्यक्ति विशेष या सामग्री विशेष की जरूरत नहीं पड़ती। कोई कर्मकांड नहीं होता। प्रकृति की पूजा है तो प्रकृति प्रदत्त चीजों से ही पूजा होती है। मिट्टी के बर्तन में अनुष्ठान के प्रसाद तैयार किए जाते हैं। आम की लकड़ी, गाय का गोबर, मिट्टी का चूल्हा, गुड और गाय के घी में बना हुआ ठेकुआ,मौसमी फल और सबसे बड़ी चीज स्वत पैदा होने वाली अटूट आस्था आदि।यह सब इस पर्व का आधार है।

ससुराल(नेपाल) से मायका(मधुरापुर)आयी वंदना पांडेय,रिंकू कुमारी(सकरी) बताती हैं कि छठ जैसे महापर्व की आज तक कभी ब्रांडिंग नहीं हुई और ना ही ब्रांडिंग हो सकती है। यह तो एक ऐसा महापर्व बन गया है, जिसे बिहार की अस्मिता को ही जगा दिया। छठ का मतलब ही है बिहार और बिहारी। छठ से कई सारी परंपराएं जुड़ गई हैं। उसी तरह जुड़ गया बिहार की लोक गायिका शारदा सिन्हा के छठ गीत। यूं तो छठ पर्व को लेकर हजारों गायको ने मधुर गीत गाए हैं पर जो गीत शुरुआती दौर में शारदा सिन्हा ने गाए हैं वे ब्रांड बन गए। 40 साल से बिहार-झारखंड के विभिन्न घाटों पर छठ करती रहीं व्रती उर्मिला सिन्हा(70) बताती हैं कि आज भी जब शारदा सिन्हा के कर्णप्रिय छठ गीत गूंजते हैं तो लगता है की छठ आ गया है।छठ लोगों के दिल-दिमाग में समा रहा है। इसके आगे और पीछे कोई भी छठ गीत कर्णप्रीय नहीं लगता और ना ही आस्था को जगा पता है।चाहे वह पटना के घाट हों या कनवां(नेपाल बॉर्डर) के घाट या फिर बागमती अथवा घर दरवाजे पर खोदी गयी कृतिम घाट।














