-‘बाबू एहू बेरी छठ पर न अईला..’
-सीनियर सिटीजन का दर्द
-गांव की झोपड़ियों में कई मां-बाप को सता रही औलादों की कमी
-नौकरी की वजहों से रिश्तों के साथ घर-वार सुना
दीपक कुमार तिवारी/अनुप नारायण सिंह।पटना/मुजफ्फरपुर।
छठ के गीत वैसे ही बेचैन करते हैं, जैसे गाय के हंकरने पर बछरू बेचैन हो जाता है।मिथिलांचल के लोगों से गांव,घर,खेत,कस्बा, होमटाउन सब छूट जाता है,लेकिन नहीं छुटता है छठ। जिसने पूरी दुनिया में बसे बिहारियों को अपनी मिट्टी से जोड़े रखा है।

शनिवार की शाम सकरी गांव में खरना की रोटी बनाने के लिए आंटा सान(गूंथ)रही वृद्धा गौड़ा देवी मोबाइल पर बतियाती हुई कह रही थीं कि ‘बाबू एहू बेरी छठ पर न अईला। तोड़ा बिन छठ पर कुछ भी अच्छा न लगई छै..पुतौहो न आइल न पोता-पोती..मां गौड़ा साड़ी की आंचल से आंखों से झहरते आंसुओं को पोंछने लगी।
बन्दरा में मनोज अपने बेटे को कहते मिले’बाबू अइसा नौकरी काहे करते हो, जहां छठ पर छुट्टी न मिले।बेटा ढांढस बढ़ाता हैं कि -नौकरियो त छठिए माई के दिहल है।”तिवारी बाबा व्यथित हैं की उनकी पोती शहर में बीमार है। वह चाहकर भी पर्व में अबकी गांव नहीं आ सकी है।बहरहाल जिनका बचपन किशोरावस्था गांव में बीता है और शहर में नौकरी की जंजीरों ने छठ जैसी परंपरागत पर्व से दूर कर दिया है।वही आदमी इस दुख को बुझ-समझ रहा है। पैसा कमाने बेहतर जिंदगी तलाश में शहर गया आदमी कब अपनी जड़ों से दूर हो जाता है। उसे पता ही नहीं चलता। मां-बाप-भाई-बहन-रिश्ते-नाते सब पीछे छूट जाते हैं। भूल जाता है कि उसे अपने घर भी वापस लौटना है। सीनियर सिटीजन के अशोक मुकुंद कहते हैं कि शहर की मोह माया उसे बांध लेती है। वह भूल जाता है उन सपनों को, जिन्हें अपने कंधों पर लेकर बह शहर गया था।अंशिका कहती हैं कि लोग हर वादा भूल जाता है।जल्द वापस अपने गांव-घर लौटने का वचन भी भूल जाता है।














