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नेपाल की तबाही: कुदरत का कहर या अनियोजित विकास की चेतावनी?

-नेपाल की तबाही: कुदरत का कहर या अनियोजित विकास की चेतावनी?

आलेख : दीपक कुमार तिवारी।

नेपाल में हालिया तबाही ने एक बार फिर हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी और विकास की हमारी दिशा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पहाड़ों में अचानक आई बाढ़, भूस्खलन और तेज जलप्रवाह ने जिस तरह जनजीवन को प्रभावित किया है, उसे केवल कुदरत का कहर कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्राकृतिक आपदाएं हिमालयी क्षेत्र की वास्तविकता हैं, लेकिन जब प्रकृति के संवेदनशील संतुलन के साथ विकास की योजनाएं टकराती हैं तो आपदा का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।

हिमालय दुनिया की सबसे युवा और संवेदनशील पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल है। यहां की पहाड़ी ढलानें भूगर्भीय रूप से सक्रिय हैं और लगातार बदलाव के दौर से गुजरती रहती हैं। ऐसे क्षेत्र में भारी बारिश अपने आप में बड़ा खतरा है, लेकिन जब पहाड़ों को काटकर सड़कें बनाई जाती हैं, जंगलों का तेजी से क्षरण होता है और ढलानों की प्राकृतिक संरचना से छेड़छाड़ होती है, तो खतरा और बढ़ जाता है। कमजोर ढलानों पर तेज बारिश का पानी मिट्टी और चट्टानों को बहाकर नीचे ले आता है। यही प्रक्रिया कई बार अचानक बाढ़ और भूस्खलन जैसी विनाशकारी घटनाओं का कारण बनती है।

नेपाल जैसे पर्वतीय देश के लिए सड़क, बिजली, पर्यटन और रोजगार के लिए बुनियादी ढांचे का विकास जरूरी है। हाइड्रोपावर परियोजनाएं देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हो सकती हैं। दूरदराज के क्षेत्रों को सड़कों से जोड़ना भी विकास की अनिवार्य जरूरत है। समस्या विकास में नहीं, बल्कि विकास के तरीके में है। यदि किसी परियोजना की योजना बनाते समय पर्यावरणीय संवेदनशीलता, भूस्खलन का जोखिम, जलप्रवाह की दिशा और स्थानीय भूगोल को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता, तो वही विकास भविष्य में बड़ी कीमत वसूल सकता है।

बड़े हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट भी अपने साथ कई तरह की चुनौतियां लेकर आते हैं। बांध और सुरंगों का निर्माण, पहाड़ों की कटाई तथा निर्माण सामग्री के लिए बड़े पैमाने पर खुदाई पहाड़ी क्षेत्रों की प्राकृतिक संरचना को प्रभावित कर सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर जलविद्युत परियोजना विनाशकारी है, बल्कि जरूरत इस बात की है कि परियोजनाओं का निर्माण वैज्ञानिक अध्ययन, मजबूत पर्यावरणीय मानकों और स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाए।

जंगल हिमालय की प्राकृतिक सुरक्षा व्यवस्था हैं। पेड़-पौधों की जड़ें मिट्टी को बांधकर रखती हैं और बारिश के पानी के बहाव को नियंत्रित करने में मदद करती हैं। जंगलों का क्षरण होने पर बारिश का पानी तेजी से ढलानों से नीचे उतरता है। इससे मिट्टी का कटाव बढ़ता है और नदियों में अचानक पानी एवं गाद की मात्रा बढ़ सकती है। इसलिए हिमालय में वन संरक्षण केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि मानव सुरक्षा और आपदा प्रबंधन का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।

नेपाल की भौगोलिक स्थिति का असर केवल नेपाल तक सीमित नहीं रहता। हिमालय से निकलने वाली कोसी, गंडक और अन्य नदियां भारत के मैदानी क्षेत्रों में प्रवेश करती हैं। नेपाल के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश या अचानक आने वाली बाढ़ का प्रभाव बिहार और उत्तर प्रदेश तक पहुंच सकता है। यही वजह है कि नेपाल में होने वाली प्राकृतिक घटनाओं पर भारत के मैदानी राज्यों की भी नजर रहती है। सीमा के दोनों ओर नदियां और उनका जलप्रवाह किसी राजनीतिक सीमा को नहीं मानते।

बिहार के लिए यह चुनौती और गंभीर है। राज्य का बड़ा हिस्सा मैदानी और अपेक्षाकृत समतल है, जबकि उत्तर बिहार की अनेक प्रमुख नदियों का जलग्रहण क्षेत्र नेपाल के पहाड़ों में है। जब ऊपरी क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश होती है और अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर आता है, तो मैदानी क्षेत्रों में नदी के जलस्तर में तेजी से वृद्धि हो सकती है। इसके साथ गाद, कटाव और तटबंधों पर दबाव की समस्या भी बढ़ जाती है। इसलिए बिहार की बाढ़ की समस्या को केवल बिहार के स्तर पर देखने के बजाय पूरे नदी बेसिन और हिमालयी जलग्रहण क्षेत्र के संदर्भ में समझना जरूरी है।

आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि विकास की आवश्यकता और पर्यावरणीय सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। सड़कें भी चाहिए, बिजली भी चाहिए, रोजगार भी चाहिए और पर्यटन का विस्तार भी जरूरी है। लेकिन इन सबके लिए पहाड़ों और नदियों की प्राकृतिक क्षमता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विकास का अर्थ केवल कंक्रीट और निर्माण नहीं, बल्कि ऐसा ढांचा तैयार करना भी है जो आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य दे सके।

हिमालय हमें बार-बार चेतावनी देता है कि प्रकृति की सीमाओं को चुनौती देकर लंबे समय तक विकास नहीं किया जा सकता। हमें ऐसी विकास नीति की जरूरत है जिसमें वैज्ञानिक जोखिम आकलन, पर्यावरणीय प्रभाव का गंभीर अध्ययन, सुरक्षित निर्माण तकनीक, जंगलों का संरक्षण और स्थानीय समुदायों की भागीदारी अनिवार्य हो। संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण की सीमा भी वैज्ञानिक आधार पर तय करनी होगी।

नेपाल की त्रासदी को केवल एक देश की आपदा मानकर भूल जाना उचित नहीं होगा। यह भारत और नेपाल दोनों के लिए एक साझा चेतावनी है। सीमापार नदियों के लिए बेहतर समन्वय, समय रहते बाढ़ की सूचना, जलस्तर की वास्तविक समय में निगरानी और आपदा प्रबंधन की संयुक्त व्यवस्था भविष्य के नुकसान को कम कर सकती है।

प्रकृति विकास की विरोधी नहीं है, लेकिन प्रकृति के नियमों की अनदेखी विकास को विनाश में बदल सकती है। इसलिए सवाल यह नहीं कि विकास होना चाहिए या नहीं। असली सवाल यह है कि विकास कैसा हो, कहां हो और किस कीमत पर हो। अगर विकास की कीमत पहाड़ों की स्थिरता, नदियों की स्वाभाविक धारा, जंगलों और इंसानी जान से चुकानी पड़े, तो उस विकास मॉडल पर सवाल उठाना जरूरी है।

नेपाल की हालिया तबाही हमें यही सोचने के लिए मजबूर करती है कि अब समय केवल आपदा आने के बाद राहत पहुंचाने का नहीं, बल्कि आपदा आने से पहले उसके कारणों को समझने और जोखिम को कम करने का है। हिमालय को बचाना केवल पहाड़ों को बचाना नहीं है; यह नेपाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और पूरे गंगा के मैदानी क्षेत्र के करोड़ों लोगों के भविष्य को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी भी है।