-जो शब्दों में नहीं उतर सका
सब कुछ कहाँ लिखा जा सकेगा,
किसी काग़ज़ की सीमित-सी दुनिया में…
क्या लिख पाएगा कोई
चिड़ियों का वह बेफिक्र चहचहाना,
पंखों में आकाश समेटकर
क्षितिज को छू आने का अफ़साना?
क्या लिख पाएगा
हवा का पेड़ों की शाखों से मिलना,
पत्तों को छूकर
धीरे-धीरे गुदगुदाना,
और किसी अनकहे प्रेम की तरह
मन के भीतर उतर जाना?
क्या शब्दों में बांधा जा सकेगा
बारिश की टप-टप करती बूंदों का संगीत,
या फिर रात की गहरी खामोशी में
झींगुर का अकेला गीत?
कुछ एहसास
स्याही से नहीं लिखे जाते,
कुछ रिश्ते
शब्दों में नहीं ढलते,
कुछ पल
बस महसूस किए जाते हैं…

शायद लिखा वही जाता है
जो मन की चौखट तक आया,
जिसने दिल को छुआ,
जिसे शब्दों ने सहलाया।
लेकिन जो आत्मा में उतर गया,
जो धड़कनों में बस गया,
जिसे महसूस तो किया गया
मगर कहा नहीं जा सका—
वह अक्सर
काग़ज़ पर उतरने से पहले ही
खामोश हो गया…
क्योंकि—
हर एहसास शब्द नहीं होता,
और हर ख़ामोशी
खाली नहीं होती।
— दीपक कुमार तिवारी












