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14 सितंबर को हरितालिका तीज और चौथ चन्दा व्रत, 15 को ऋषि पंचमी

-14 सितंबर को हरितालिका तीज और चौथ चन्दा व्रत, 15 को ऋषि पंचमी

मोतिहारी, राजन द्विवेदी। महिलाओं के अखंड सौभाग्य और सुखी दांपत्य जीवन की कामना से किया जाने वाला हरितालिका (तीज) व्रत इस वर्ष 14 सितंबर, सोमवार को मनाया जाएगा। इसी दिन बिहार में प्रचलित चौथ चन्दा (ढेलहिया चौथ) एवं चंद्र पूजा का भी विधान है। वहीं ऋषि पंचमी व्रत 15 सितंबर, मंगलवार को मनाया जाएगा। इसी दिन वैनायकी सिद्धि विनायक श्रीगणेश चतुर्थी का प्रसिद्ध पर्व भी मनाया जाएगा और इसके साथ देशव्यापी गणेशोत्सव का शुभारंभ होगा।

महर्षिनगर स्थित आर्षविद्या शिक्षण प्रशिक्षण सेवा संस्थान-वेद विद्यालय के प्राचार्य सुशील कुमार पाण्डेय ने पर्वों की तिथियों की जानकारी देते हुए बताया कि हरितालिका तीज का व्रत सौभाग्यवती महिलाएं अखंड सौभाग्य की कामना से करती हैं, जबकि अविवाहित कन्याएं मनोनुकूल वर और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से इस कठिन व्रत का पालन करती हैं।

प्राचार्य पाण्डेय के अनुसार शास्त्रीय मान्यता में हरितालिका व्रत को श्रेष्ठ व्रतों में माना गया है। श्रद्धा और निष्ठा से इस व्रत का पालन करने वाली महिलाओं को सौभाग्य, संतान सुख, धन-धान्य और मनोवांछित फल की प्राप्ति होने की मान्यता है। व्रत के दिन महिलाएं शुद्ध मन और शरीर से उपवास रखकर प्रदोषकाल में माता पार्वती के साथ भगवान शिव की पूजा करती हैं। रात्रि में मंगलगीत और जागरण के बाद अगले दिन प्रातः अन्न, वस्त्र और दक्षिणा आदि का दान करने के बाद पारण किया जाता है।

14 सितंबर को ही चौथ चन्दा और गणेश चतुर्थी:

बिहार में प्रचलित चौथ चन्दा (ढेलहिया चौथ) एवं चंद्र पूजा भी 14 सितंबर को होगी। इस दिन चंद्रमा को देखना निषिद्ध माना जाता है। प्राचार्य ने बताया कि भगवान गणेश को विघ्न विनाशक माना गया है और उनकी उपासना से कार्यों में सफलता तथा ज्ञान की वृद्धि होने की मान्यता है। व्रत के दिन भगवान गणेश की प्रतिमा पर सिंदूर अर्पित कर लड्डू का भोग लगाने की परंपरा है।

15 सितंबर को ऋषि पंचमी व्रत:

ऋषि पंचमी व्रत का पर्व 15 सितंबर, मंगलवार को मध्याह्न व्यापिनी पंचमी तिथि में मनाया जाएगा। इस दिन स्नान, शुद्धिकरण और सप्तऋषियों की पूजा का विधान बताया गया है। परंपरा के अनुसार अपामार्ग (चिचिड़ा) से दंतधावन और स्नान के बाद अपामार्ग तथा कुश से निर्मित अरुंधती सहित सप्तऋषियों की प्रतिमा स्थापित कर विधिपूर्वक पूजा की जाती है।

प्राचार्य पाण्डेय ने बताया कि धार्मिक मान्यता के अनुसार ऋषि पंचमी व्रत के प्रभाव से रजस्वला दोष सहित शरीर और मन से किए गए पापों का नाश होता है। इस व्रत को सात वर्षों तक करने का विधान बताया गया है।