-भाई-बहन के अटूट रिश्ते का पर्व है सामा-चकेवा,हो गयी शुरुआत
दीपक कुमार तिवारी। मुजफ्फरपुर
बिहार के मिथिलांचल में सामा-चकेवा का खास महत्व है। यह पर्व छठ के समापन के साथ ही शुरू हो जाता है और धूमधाम से मनाने की परंपरा है।लिहाजा क्षेत्र के हाट-बाजारों में सामा-चकेवा की बिक्री शुरू हो गयी। इस पर्व को भाई-बहन के प्यार के तौर पर मनाया जाता है। इसको लेकर मूर्तिकारों के द्वारा सामा-चकेवा के साथ सतभैया, चुगला जैसे जुड़ी तमाम मूर्तियों का निर्माण भी कराया जा रहा है और उनको अंतिम स्वरूप दिया जा रहा है। सामा-चकेवा पर्व का संबंध पर्यावरण से भी माना जाता है। पारंपरिक लोकगीतों से जुड़ा सामा-चकेवा मिथिला संस्कृति की वह खासियत है, जो सभी समुदायों के बीच व्याप्त जड़ बाधाओं को तोड़ता है। आठ दिनों तक यह उत्सव मनाया जाता है और नौवें दिन बहनें अपने भाइयों को धान की नयी फसल का चूड़ा एवं दही खिला कर सामा-चकेवा की मूर्तियों को नदी-तालाब में विसर्जित कर देते हैं।

यह है पौराणिक कथा:
पौराणिक कथाओं के मुताबिक, भगवान कृष्ण की पुत्री श्यामा और पुत्र शाम्भ के बीच अपार स्नेह था। कृष्ण की पुत्री श्यामा ऋषि कुमार चारूदत्त से ब्याही गयी थी। श्यामा ऋषि मुनियों की सेवा करने बराबर उनके आश्रमों में जाया करती थी। भगवान कृष्ण के मंत्री चुरक को रास नहीं आया और उसने श्यामा के विरूद्ध राजा से शिकायत करना शुरू कर दिया। क्रुद्ध होकर भगवान श्रीकृष्ण ने श्यामा को पक्षी बन जाने का श्राप दे दिया। श्यामा का पति चारूदत्त भी शिव की पूजा-अर्चना कर उन्हें प्रसन्न कर स्वयं भी पक्षी का रूप प्राप्त कर लिया।श्यामा के भाई एवं भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र शाम्भ ने अपने बहन-बहनोई की इस दशा से दुखी होकर अपने पिता की आराधना शुरू कर दी। इससे प्रसन्न होकर श्राप से मुक्ति के उपाय बताया। शरद महीने में सामा-चकेवा पक्षी की जोड़ियां मिथिला में प्रवास करने पहुंच गयी थीं। भाई साम्भ भी उसे खोजते मिथिला पहुंचे और वहां की महिलाओं से अपने बहन-बहनोई को श्राप से मुक्त करने के लिए सामा-चकेवा का खेल खेलने का आग्रह किया और कहते हैं कि उसी द्वापर युग से आजतक इसका आयोजन हो रहा है।
गृहिणी चित्ररेखा देवी,मिथलेश देवी आदि बताती हैं कि सामा-चकेवा पूरे मिथिला में भाई बहन के प्रेम और सौहार्द का प्रतीक पर्व माना जाता है। इस पर्व में सामा-चकेवा के अलावा कई सारे और भी मूर्तियां बनती हैं, जिसका अपना एक अलग महत्व होता है। उन्होंने बताया कि सामा-चकेवा के अलावा वृंदावन, चुगला, सतभइया, ढकना, खटिया, पौउती जैसे मिट्टी की सामग्री बनती है और बहना इसके साथ पूजा करती है।
क्षेत्र में मूर्तिकारों के द्वारा सामा चकेवा के साथ अन्य मिट्टी के मूर्तियां बनाई जा रही हैं। विगत वर्ष पूरा सेट 100 रुपए में बिका था।अबकी 150से 200 रुपए तक बिक रहे हैं। महंगाई को देखते हुए इन मूर्ति कारों के द्वारा इस बार सामा-चकेवा के साथ जुड़ी अन्य सभी मूर्तियों मूर्तियों की कीमत को बढ़ाया गया है। इसके बावजूद इसकी खरीददारी को लेकर लोग बाजार पहुंच रहे हैं।
यह है पर्व की महानता:
सन्दरा देवी बताती हैं कि इस पर्व को क्षेत्र में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस पर्व को बहन अपने भाई की दीर्घायु होने की कामना के लिए करती है। इसमें बहन-भाई के बीच प्यार का रिस्ता मजबूत होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में अगर देखेंगे तो करीबन प्रत्येक घर में इस पर्व को मनाया जाता है। हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार संध्याकाल में अपने-अपने घरों से सामा-चकेवा के साथ जुड़ी अन्य मूर्तियों को लेकर एक जगह पूरे गांव या पूरे टोले की लड़कियां इकट्ठा होती हैं और वहां इसकी गीत गाते हैं। यह छठ के तुरंत बाद प्रारंभ होता है और कार्तिक पूर्णिमा के दिन विसर्जन के साथ इसका समापन होता है।














