-नेपाल में हिंदू राष्ट्र की वापसी की मांग तेज, चर्च गतिविधियों और धार्मिक बदलाव पर उठे सवाल
मुजफ्फरपुर। नेपाल के सुनसरी में सांप्रदायिक हिंसा की घटना के बाद देश में धार्मिक पहचान और घुसपैठ को लेकर बहस तेज हो गई है। कुछ हिंदू संगठनों और नेताओं की ओर से नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग उठाई जा रही है। उनका आरोप है कि मुस्लिम घुसपैठ के साथ ही मिशनरी गतिविधियों और चर्चों की संख्या में वृद्धि हो रही है, जिस पर नियंत्रण जरूरी है।
नेपाल में वर्ष 1990 तक हिंदू राष्ट्र की व्यवस्था थी। 1990 के जन आंदोलन के बाद देश में राजनीतिक बदलाव शुरू हुए और धर्मनिरपेक्षता की दिशा में माहौल तैयार हुआ। वर्ष 2006-07 के राजनीतिक बदलावों के बाद नेपाल को औपचारिक रूप से धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया गया। इसके बाद नागरिकों को अपनी इच्छा के अनुसार धर्म चुनने और परिवर्तन करने का कानूनी वातावरण पहले की तुलना में अधिक सहज हुआ।
इसी दौर में विदेशी सहयोग से संचालित स्वयंसेवी संस्थाओं और मिशनरी गतिविधियों के विस्तार का दावा किया जाता रहा है। राष्ट्रीय मुक्ति पार्टी के पूर्व केंद्रीय प्रवक्ता और मधेशवादी नेता रमन पांडेय का कहना है कि माओवादी आंदोलन और उसके बाद हुए राजनीतिक बदलावों के दौरान ईसाई समुदाय से जुड़ी गतिविधियां बढ़ीं। उनका आरोप है कि इससे नेपाल की धार्मिक और जनसांख्यिकीय स्थिति में बदलाव आ रहा है।

पांडेय के अनुसार, कम्युनिस्ट शासन के दौरान विदेशी चर्च संगठनों की गतिविधियां भी सार्वजनिक रूप से सामने आने लगीं। इसी को लेकर हिंदू राष्ट्र की वापसी के पक्ष में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर गोलबंदी बढ़ रही है।
दलित और जनजातीय समुदायों पर विशेष फोकस का आरोप
राष्ट्रीय एकता दल के अध्यक्ष विनय यादव का दावा है कि तराई से लेकर पहाड़ी क्षेत्रों तक चर्च नेटवर्क का विस्तार तेजी से हुआ है। उन्होंने कहा कि दलित और जनजातीय समुदायों को विशेष रूप से मिशनरी गतिविधियों के केंद्र में रखा जा रहा है।
यादव के मुताबिक, मधेशी आयोग और अन्य सर्वेक्षणों में नेपाल में 7,750 से अधिक पंजीकृत चर्च संचालित होने की बात सामने आई है। हालांकि, चर्चों की संख्या और धार्मिक जनसंख्या में बदलाव से जुड़े दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
नेपाल में हिंदू राष्ट्र की बहाली का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक बहस का विषय रहा है। हालिया घटनाओं के बाद इस मांग को लेकर विभिन्न हिंदू संगठनों और राजनीतिक समूहों की सक्रियता बढ़ने की बात कही जा रही है।












