-नदी-तालाबों में विसर्जन के साथ भाई-बहन के अटूट रिश्ते का पर्व सामा-चकेवा का समापन
दीपक कुमार तिवारी। मुजफ्फरपुर/सीतामढ़ी।
कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर रविवार को नदी-तालाबों में विसर्जन के साथ भाई-बहन के अटूट रिश्ते का पर्व सामा-चकेवा का समापन हो गया।सामा की विदाई के दौरान महिलाएं काफी निराश दिखीं।विसर्जन के दौरान महिलाओं के सानिध्य में नवयुवतियों द्वारा सस्वर गायी जा रही कर्णप्रिय एवं हृदयस्पर्शी पारंपरिक विदाई गीतों से माहौल कारुणिक बना रहा। घर से घाट तक पारंपरिक गीतों के बीच केले के थम्ब,बांस के फट्ठी आदि से बने बेरा पर सामा चकेवा को भाई माथे पर लेकर और साथ में बहनों की टोलियां विदाई की गीत गाती चल रही थी।कई गांवों में डीजे साउंड के बीच तो कई गांवों बैंडबाजा धुनों के बीच सामा का विसर्जन किया गया। इस दौरान बहनों ने भाइयों को बजरी भी खिलाई और भाइयों से उपहार(नेग) भी ली। शालिनी तिवारी,गुड़िया कुमारी, उषा देवी,मिथलेश देवी,चित्ररेखा देवी आदि महिलाओं ने बताया कि ऐसी मान्यता है कि बजरी खिलाने पर यदि भाई नेग नहीं देता है तो बहने भाई को बज्र(कठोर)हो जाने का श्राप दे देती है।लिहाजा श्राप से बचने के लिए भाई अपने बहन को कुछ न कुछ नेग(उपहार)अवश्य देती हैं।

ऐसी है मान्यता:
बिहार के मिथिलांचल में सामा-चकेवा का खास महत्व है। यह पर्व छठ के समापन के साथ ही शुरू हो जाता है और धूमधाम से मनाने की परंपरा है। इस पर्व को भाई-बहन के प्यार के तौर पर मनाया जाता है।मिथिलांचल के कई इलाकों में इसको लेकर मूर्तिकारों के द्वारा सामा-चकेवा के साथ सतभैया, चुगला जैसे जुड़ी तमाम मूर्तियों का निर्माण भी किया जाता और बेचा जाता है।सामा-चकेवा पर्व का संबंध पर्यावरण से भी माना जाता है। पारंपरिक लोकगीतों से जुड़ा सामा-चकेवा मिथिला संस्कृति की वह खासियत है, जो सभी समुदायों के बीच व्याप्त जड़ बाधाओं को तोड़ता है। आठ दिनों तक यह उत्सव मनाया जाता है और नौवें दिन बहनें अपने भाइयों को धान की नयी फसल का चूड़ा एवं दही खिला कर सामा-चकेवा की मूर्तियों को नदी-तालाब में विसर्जित कर देते हैं।
यह है पौराणिक कथा:
पौराणिक कथाओं के मुताबिक, भगवान कृष्ण की पुत्री श्यामा और पुत्र शाम्भ के बीच अपार स्नेह था। कृष्ण की पुत्री श्यामा ऋषि कुमार चारूदत्त से ब्याही गयी थी। श्यामा ऋषि मुनियों की सेवा करने बराबर उनके आश्रमों में जाया करती थी। भगवान कृष्ण के मंत्री चुरक को रास नहीं आया और उसने श्यामा के विरूद्ध राजा से शिकायत करना शुरू कर दिया। क्रुद्ध होकर भगवान श्रीकृष्ण ने श्यामा को पक्षी बन जाने का श्राप दे दिया। श्यामा का पति चारूदत्त भी शिव की पूजा-अर्चना कर उन्हें प्रसन्न कर स्वयं भी पक्षी का रूप प्राप्त कर लिया।श्यामा के भाई एवं भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र शाम्भ ने अपने बहन-बहनोई की इस दशा से दुखी होकर अपने पिता की आराधना शुरू कर दी। इससे प्रसन्न होकर श्राप से मुक्ति के उपाय बताया। शरद महीने में सामा-चकेवा पक्षी की जोड़ियां मिथिला में प्रवास करने पहुंच गयी थीं। भाई साम्भ भी उसे खोजते मिथिला पहुंचे और वहां की महिलाओं से अपने बहन-बहनोई को श्राप से मुक्त करने के लिए सामा-चकेवा का खेल खेलने का आग्रह किया और कहते हैं कि उसी द्वापर युग से आजतक इसका आयोजन हो रहा है।
गृहिणी चित्ररेखा देवी,मिथलेश देवी आदि बताती हैं कि सामा-चकेवा पूरे मिथिला में भाई बहन के प्रेम और सौहार्द का प्रतीक पर्व माना जाता है। इस पर्व में सामा-चकेवा के अलावा कई सारे और भी मूर्तियां बनती हैं, जिसका अपना एक अलग महत्व होता है। उन्होंने बताया कि सामा-चकेवा के अलावा वृंदावन, चुगला, सतभइया, ढकना, खटिया, पौउती जैसे मिट्टी की सामग्री बनती है और बहना इसके साथ पूजा करती है।क्षेत्र में मूर्तिकारों के द्वारा सामा चकेवा के साथ मिट्टी की अन्य मूर्तियां बनाई जाती है।

यह है पर्व की महानता:
चित्ररेखा देवी एवं सन्दरा देवी बताती हैं कि इस पर्व को क्षेत्र में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस पर्व को बहन अपने भाई की दीर्घायु होने की कामना के लिए करती है। इसमें बहन-भाई के बीच प्यार का रिस्ता मजबूत होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में अगर देखेंगे तो करीबन प्रत्येक घर में इस पर्व को मनाया जाता है। हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार संध्याकाल में अपने-अपने घरों से सामा-चकेवा के साथ जुड़ी अन्य मूर्तियों को लेकर एक जगह पूरे गांव या पूरे टोले की लड़कियां इकट्ठा होती हैं और वहां इसकी गीत गाते हैं। यह छठ के तुरंत बाद प्रारंभ होता है और कार्तिक पूर्णिमा के दिन विसर्जन के साथ इसका समापन होता है।











