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अभी समय है ईश्वरीय विधि-विधान को जानकर उस अनुसार चलने का

*अभी समय है ईश्वरीय विधि-विधान को जानकर उस अनुसार चलने का*

खानपुर: दुर्गा मंदिर परिसर में प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की समस्तीपुर शाखा द्वारा पिछले 5 दिनों से चल रहे सात दिवसीय राजयोग मेडिटेशन शिविर से आगंतुक शिविरार्थियों में आत्म-ज्ञान और परमात्म-ज्ञान को जानने की ललक देखने को मिल रही है।

बीके सविता बहन ने राजयोग शिविर के पांचवें दिन कर्मों की गहन गति के बारे में विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कर्मों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हम जो भी कर्म करते हैं उसका फल हमें अवश्य मिलता है। जब हम आत्म-स्मृति में स्थित होकर आत्मा के मूल गुणों- ज्ञान, शांति, प्रेम, पवित्रता आदि के अनुरूप कर्म करते हैं तो हमें वर्तमान और भविष्य में श्रेष्ठ फल की प्राप्ति होती है। इसके विपरीत यदि हम स्वयं को देह मानकर काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि मनोविकारों के वशीभूत होकर कर्म करते हैं तो इससे हमारे वर्तमान और भविष्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। मनुष्य आत्मा कर्म करने के लिए तो स्वतंत्र है लेकिन कर्म करते ही वह फल के बंधन में बंध जाती है। जैसे सरकार के नियम-कानूनों का पालन करना आवश्यक है, वैसे ही ईश्वरीय नियम-कायदों का पालन भी अति आवश्यक है।

भले कोई चालाकी से यहां की सरकार के कानून का उल्लंघन करने के बावजूद सजा से बच जाए लेकिन ईश्वरीय विधि-विधान को कभी चकमा नहीं दिया जा सकता। परमात्मा किसी को सजा नहीं देते लेकिन कर्मों का ज्ञान देते हैं। हमारे कर्म ही हमें सजा या ईनाम की अनुभूति कराते हैं। इनसे ही हमें सुख या दुःख मिलता है। हमारा सोचना, देखना, सुनना, बोलना या किसी भी कर्मेंद्रिय से कुछ करना कर्म कहलाता है और इन सभी का फल हमारे खाते में डेबिट या क्रेडिट के रूप में जमा होता है। इसे कर्मों का खाता कहा जाता है। हमारे यहां कहा गया है चित्रगुप्त सबके कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं। चित्रगुप्त अर्थात् जिनका चित्र गुप्त है अर्थात् जो निराकार परमपिता परमात्मा शिव हैं। चित्रगुप्त पूजा के दिन कलम-दवात की पूजा का महत्व होता है। स्वयं परमात्मा अभी हमें श्रेष्ठ कर्मों की कलम से तकदीर की लंबी लकीर खींचने का सुनहरा अवसर प्रदान कर रहे हैं। इसके लिए वह हमें श्रेष्ठ कर्म का भी ज्ञान दे रहे हैं और श्रेष्ठ तकदीर की तस्वीर भी दिखा रहे हैं। हम परमात्मा की याद से पुराने पाप कर्मों के दुष्प्रभाव को नष्ट कर सकते हैं और श्रेष्ठ कर्मों का खाता बेइंतहां जमा कर सकते हैं। अभी समय है ईश्वरीय विधि-विधान को जानकर उस अनुसार चलने का।